Wednesday, February 11, 2026
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‘अंजाम भुगतना होगा….’, ताइवान के साथ आर्म्स डील को लेकर चीन ने दी अमेरिका को धमकी

नई दिल्ली: ताइवान को लेकर एक बार फिर चीन और अमेरिका आमने-सामने आ सकते हैं। अमेरिका ने ताइवान को 11 बिलियल डॉलर तक के हथियारों की ब्रिकी को मंजूरी दे दी है, जिसके बाद चीन ने नाराजगी जाहिर की है। चीन ने इशारा किया है वाशिंगट के इस कदम से दो महाशक्तियों के बीच टकराव की संभावना बढ़ गई है।

विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता, गुओ जियाकुन ने एक प्रेस ब्रीफिंग में कहा कि सैन्य सहायता ने ताइवान के लोगों को बारूद के ढेर पर बिठा दिया है। ताइवान को खतरे की ओर धकेल दिया है और अनिवार्य रूप से चीन-अमेरिका संघर्ष और टकराव का खतरा बढ़ा दिया है।

ताइवान को हथियार देने होंगे गंभीर परिणाम- चीन

उन्होंने कहा कि ताइवान को हथियार देने की किसी भी कदम के गंभीर परिणाम होंगे। बीजिंग ने इस मुद्दे पर वाशिंगटन से राजनयिक शिकायत भी दर्ज कराई है। साथ ही उन्होंने कहा कि उनका देश राष्ट्रीय संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता की रक्षा के लिए सभी आवश्यक कदम उठाएगा।

शुक्रवार को ही, चीन के रक्षा मंत्रालय ने कहा कि वह प्रशिक्षण और युद्ध की तैयारियों को तेज करना जारी रखेगा। सेना राष्ट्रीय संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता की रक्षा के लिए कड़े कदम उठाएगी।

ताइवान के साथ रक्षा संबंधों की मजबूती पर अमेरिका का जोर

चीन की ओर से ये टिप्पणी स्टेट डिपार्टमेंट द्वारा ताइवान को अमेरिका की ओर से अब तक की सबसे बड़ी हथियारों की बिक्री में से एक को मंजूरी देने का बाद आई है। इस पैकेज में मिसाइल, ड्रोन और तोपखाने शामिल हैं। यह डील संकेत देती है कि ट्रंप प्रशासन ताइवान के साथ अपने मजबूत रक्षा संबंधों को आगे बढ़ाना चाहता है, भले ही वह चीन के साथ अपने व्यापार और आर्थिक संबंधों को बढ़ा रहा हो।

इस प्रस्ताव को अमेरिका की सभी विदेशी सैन्य बिक्री की तरह कांग्रेस की मंजूरी की आवश्यकता होगी। हाउस फॉरेन अफेयर्स और सीनेट फॉरेन रिलेशंस की कमेटियों से बिना किसी विरोध के पारित होने की उम्मीद है, जैसा कि ताइवान को लेकर पूर्व में होता आया है।

ताइवान को अपना हिस्सा मानता है चीन

चीन, ताइवान को एक अलग हुआ प्रांत मानता है, जिसे जरूरत पड़ने पर बलपूर्वक अपने नियंत्रण में लाया जाना चाहिए। हलांकि चीन के इस रुख को ताइपे हमेशा खारिज करता रहा है।

ताइवान पर क्या है अमेरिका का रुख?

अमेरिका ताइवान का सबसे बड़ा सैन्य समर्थक है और उसे कानूनी रूप से ताइपे को अपनी रक्षा करने में मदद करनी होती है। हालांकि अमेरिका इस बारे में रणनीतिक अस्पष्टता की नीति का पालन करता है कि क्या वह किसी भी लड़ाई में शामिल होगा? उस नीति के तहत, वाशिंगटन को बल के प्रयोग का अधिकार है लेकिन वह स्पष्ट रूप से यह नहीं बताता कि वह हस्तक्षेप करेगा या नहीं।

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