नई दिल्ली। चुनाव आयोग यानी लोकतंत्र का सबसे बड़ा प्रहरी। यह संवैधानिक संस्था देश में लोकसभा, विधानसभा और राष्ट्रपति-उपराष्ट्रपति जैसे चुनावों की प्रक्रिया को संचालित करती है। आमतौर पर चुनाव आयोग से यह उम्मीद की जाती है कि महत्वपूर्ण फैसलों पर आयोग के सभी सदस्यों की एक राय हो, लेकिन इतिहास बताता है कि चुनाव आयुक्तों के बीच हर मुद्दे पर हमेशा एक जैसी राय नहीं रही है। कई मौकों पर आयोग के भीतर अलग-अलग विचार सामने आए हैं और कुछ मामलों में असहमति को रिकॉर्ड पर भी दर्ज किया गया है।
मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार, चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी से जुड़े मौजूदा घटनाक्रम ने एक बार फिर चुनाव आयोग के भीतर होने वाली निर्णय प्रक्रिया और उसमें मतभेद की गुंजाइश को चर्चा के केंद्र में ला दिया है। मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR को लेकर दो चुनाव आयुक्तों की ओर से कथित तौर पर आपत्तियां दर्ज किए जाने की रिपोर्ट सामने आई। हालांकि, चुनाव आयोग ने इन रिपोर्टों के बाद स्पष्ट किया कि अलग-अलग विचार या टिप्पणियां अंतिम निर्णय नहीं होतीं और आयोग के सभी अंतिम फैसले सर्वसम्मति से लिए गए हैं।
मौजूदा विवाद में क्या सामने आया?
इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले करीब 10 महीनों में चुनावी प्रक्रिया से जुड़े कई मुद्दों पर आपत्तियां दर्ज की थीं। रिपोर्ट में 14 ऐसे मौकों का जिक्र किया गया है, जिनमें मतदाता सूची में नाम जोड़ने और हटाने, फॉर्म-6 में बदलाव, चुनावी सॉफ्टवेयर और पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची से जुड़े मामलों जैसे विषय शामिल बताए गए हैं।
रिपोर्ट में यह भी बताया गया कि कुछ आपत्तियां चुनावी प्रक्रिया के तकनीकी और प्रशासनिक पहलुओं से जुड़ी थीं। इनमें ERONet सिस्टम के नियंत्रण को केंद्रीय स्तर पर रखने और कुछ पात्र मतदाताओं के नाम सूची में शामिल न किए जा पाने जैसे मुद्दे भी शामिल बताए गए हैं।
हालांकि, इन रिपोर्टों के बाद चुनाव आयोग ने इसे संस्थागत विभाजन के तौर पर पेश किए जाने से इनकार किया। आयोग के अनुसार, किसी भी संस्था में फैसले से पहले सवाल, सुझाव, टिप्पणियां और अलग-अलग राय सामने आना सामान्य प्रक्रिया का हिस्सा है। आयोग ने कहा कि अंतिम निर्णय सभी सदस्यों की मंजूरी से लिए गए हैं।
चुनाव आयोग में बहुमत से भी फैसला हो सकता है
चुनाव आयोग की निर्णय प्रक्रिया को लेकर एक महत्वपूर्ण बात यह है कि कानून में असहमति की स्थिति का प्रावधान मौजूद रहा है। पुराने कानूनी प्रावधानों के मुताबिक आयोग के कामकाज को जहां तक संभव हो, सर्वसम्मति से संचालित किया जाना था। लेकिन यदि मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्त किसी मामले में अलग राय रखते हैं और सहमति नहीं बनती, तो बहुमत के आधार पर निर्णय लिया जा सकता है। यानी तीन सदस्यीय आयोग में मुख्य चुनाव आयुक्त की राय अपने आप अंतिम नहीं हो जाती।
इस व्यवस्था में तीनों सदस्यों को निर्णय प्रक्रिया में बराबर महत्व दिया जाता है। यदि तीनों के बीच किसी मामले पर सहमति नहीं बनती, तो दो सदस्यों की राय बहुमत बन सकती है। ऐसे मामलों में असहमति को रिकॉर्ड पर रखने की व्यवस्था भी रही है।
कभी एक सदस्यीय था चुनाव आयोग
भारत में चुनाव आयोग की शुरुआत एक सदस्यीय संस्था के रूप में हुई थी। लंबे समय तक मुख्य चुनाव आयुक्त ही आयोग का नेतृत्व करते थे। बाद में चुनाव आयोग को बहुसदस्यीय संस्था बनाने की प्रक्रिया शुरू हुई।
16 अक्टूबर 1989 को तत्कालीन सरकार ने दो चुनाव आयुक्त नियुक्त किए और आयोग को तीन सदस्यीय बनाया गया। हालांकि, यह व्यवस्था लंबे समय तक नहीं चली और जनवरी 1990 में चुनाव आयोग फिर एक सदस्यीय हो गया। इसके बाद 1993 में दो और चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति का प्रावधान किया गया और तब से चुनाव आयोग तीन सदस्यीय व्यवस्था में काम करता आ रहा है।
इस बदलाव ने चुनाव आयोग के भीतर सामूहिक निर्णय की व्यवस्था को महत्वपूर्ण बना दिया। मौजूदा समय में मुख्य चुनाव आयुक्त और दो चुनाव आयुक्त मिलकर आयोग के फैसलों पर विचार करते हैं।
2009 में भी सामने आया था मतभेद
चुनाव आयोग के इतिहास में ऐसे मामले भी रहे हैं, जब किसी महत्वपूर्ण संवैधानिक या चुनावी विषय पर सदस्यों की राय अलग-अलग रही। 2009 में सोनिया गांधी की कथित अयोग्यता से जुड़े मामले में तत्कालीन मुख्य चुनाव आयुक्त एन. गोपालस्वामी और चुनाव आयुक्त एसवाई कुरैशी तथा नवीन चावला की अलग-अलग राय सामने आई थी।
इस मामले में अलग-अलग सदस्यों ने अपनी राय दर्ज की थी। यह उदाहरण बताता है कि चुनाव आयोग में मतभेद होना अपने आप में कोई नई या असाधारण व्यवस्था नहीं है।
अशोक लवासा का मामला भी रहा चर्चा में
हाल के वर्षों में चुनाव आयोग के भीतर असहमति का सबसे चर्चित उदाहरण पूर्व चुनाव आयुक्त अशोक लवासा से जुड़ा रहा। 2019 के लोकसभा चुनाव के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमित शाह से जुड़े कुछ भाषणों की शिकायतों पर आयोग की बैठकों में लवासा ने अलग राय रखी थी। इस घटनाक्रम के बाद चुनाव आयोग की आंतरिक निर्णय प्रक्रिया और असहमति दर्ज करने के अधिकार को लेकर सार्वजनिक चर्चा हुई।
अशोक लवासा बाद में चुनाव आयोग से अलग हो गए। चुनाव आयोग की आधिकारिक वेबसाइट पर उन्हें पूर्व चुनाव आयुक्तों की सूची में दर्ज किया गया है।
यह घटनाक्रम इसलिए महत्वपूर्ण माना गया क्योंकि इससे यह सवाल सामने आया कि चुनाव आयोग के किसी सदस्य की असहमति किस तरह रिकॉर्ड की जाती है और अंतिम आदेश में उसका क्या स्थान होता है।
क्या मतभेद का मतलब आयोग का फैसला अलग था?
मौजूदा SIR विवाद में सबसे महत्वपूर्ण अंतर यही है कि किसी सदस्य की आपत्ति और आयोग के अंतिम फैसले को एक ही चीज नहीं माना जा सकता। चुनाव आयोग का कहना है कि आंतरिक नोट, सवाल, सुझाव और टिप्पणियां निर्णय प्रक्रिया का हिस्सा हैं। अंतिम आदेश आयोग की सामूहिक मंजूरी के बाद जारी होते हैं।
23 सितंबर को आयोग की ओर से जारी स्पष्टीकरण में कहा गया कि अलग-अलग विचार सामान्य संस्थागत प्रक्रिया का हिस्सा हैं। आयोग ने यह भी कहा कि उसके आदेश, सुधार और डिजिटल प्रणालियां कानूनी प्रक्रिया और आयोग की मंजूरी के अनुसार संचालित हैं।
दूसरी ओर, इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट ने जिन आपत्तियों का उल्लेख किया है, वे मतदाता पंजीकरण, नाम हटाने और चुनावी तकनीकी प्रणालियों जैसे महत्वपूर्ण विषयों से जुड़ी बताई गई हैं। इसलिए इस पूरे मामले ने चुनाव आयोग की आंतरिक कार्यप्रणाली को सार्वजनिक बहस में ला दिया है।
SIR के बीच क्यों बढ़ा मामला?
मौजूदा विवाद ऐसे समय सामने आया है जब मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR को लेकर देशभर में चर्चा है। चुनाव आयोग का उद्देश्य मतदाता सूची को अपडेट करना और उसमें मौजूद गलत, डुप्लीकेट या अपात्र प्रविष्टियों की पहचान करना है। लेकिन इस प्रक्रिया में नाम जोड़ने और हटाने की प्रक्रिया को लेकर राजनीतिक दलों और नागरिक समूहों की ओर से अलग-अलग सवाल उठते रहे हैं।
दिल्ली में SIR प्रक्रिया को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने भी हाल में चुनाव आयोग से कुछ नोटिसों और ‘लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी’ की प्रक्रिया पर स्पष्टीकरण मांगा है। अदालत ने कुछ मामलों में नोटिस जारी करने की प्रक्रिया पर सवाल उठाते हुए मतदाताओं को जवाब देने के लिए व्हाट्सऐप और ईमेल जैसे माध्यमों पर भी विचार करने का सुझाव दिया।
इतिहास क्या बताता है?
चुनाव आयोग के इतिहास से यह स्पष्ट है कि अलग-अलग सदस्यों की राय में अंतर होना बिल्कुल नया घटनाक्रम नहीं है। कभी-कभी असहमति बैठक और आंतरिक नोट तक सीमित रहती है, जबकि कुछ मामलों में अलग राय सार्वजनिक रिकॉर्ड का हिस्सा बन जाती है।
साथ ही, यह भी महत्वपूर्ण है कि आयोग की संस्थागत व्यवस्था में अंतिम निर्णय के लिए बहुमत का प्रावधान मौजूद है। यानी यदि तीनों सदस्यों की राय अलग हो, तो दो सदस्यों की राय के आधार पर फैसला लिया जा सकता है। दूसरी ओर, जब सभी सदस्य सहमत होते हैं तो फैसला सर्वसम्मति से होता है।
मौजूदा मामले में चुनाव आयोग ने स्पष्ट किया है कि SIR समेत सभी अंतिम फैसले तीनों सदस्यों की मंजूरी से लिए गए हैं। वहीं, रिपोर्टों में दो चुनाव आयुक्तों की ओर से अलग-अलग चरणों में आपत्तियां दर्ज किए जाने की बात सामने आई है। ऐसे में इस पूरे विवाद का केंद्र अब यही है कि आंतरिक विचार-विमर्श और अंतिम संस्थागत निर्णय के बीच अंतर को किस तरह समझा जाए।
चुनाव आयोग की भूमिका को देखते हुए यह चर्चा महत्वपूर्ण है, क्योंकि मतदाता सूची से लेकर चुनाव कार्यक्रम और मतदान प्रक्रिया तक उसके फैसलों का सीधा संबंध लोकतांत्रिक प्रक्रिया से होता है। इसलिए आयोग के भीतर होने वाली बहस, असहमति और अंतिम निर्णय की प्रक्रिया पर सार्वजनिक नजर रहना स्वाभाविक है।
फिलहाल चुनाव आयोग का आधिकारिक रुख स्पष्ट है—अलग-अलग राय और सुझाव निर्णय प्रक्रिया का हिस्सा हो सकते हैं, लेकिन SIR समेत आयोग के अंतिम फैसले सर्वसम्मति से लिए गए हैं। वहीं, इतिहास यह भी दिखाता है कि चुनाव आयोग के सदस्यों के बीच मतभेद पहले भी सामने आते रहे हैं और कानून ने ऐसी स्थिति में बहुमत से निर्णय लेने की व्यवस्था बनाई हुई है।



