ट्रंप युद्ध हार चुका है, इसलिए अभद्र भाषा का इस्तेमाल कर रहा है: मौलाना कल्बे जवाद नक़वी

आयतुल्लाह ख़ामेनई की शहादत की याद में बड़े इमामबाड़े में ऐतिहासिक सभा “यादे शोहदा” आयोजित, विभिन्न धर्मों और संप्रदायों के उलमा और बुद्धिजीवियों ने भाग लिया।
लखनऊ: शहीद आयतुल्लाह सैय्यद अली ख़ामेनई (र.अ) और तमाम शोहदा-ए-इंसानियत की याद में लखनऊ के बड़े इमामबाड़े में “यादे शोहदा” शीर्षक से एक सभा आयोजित की गई, जिसमें अयातुल्लाह ख़ामेनई के प्रतिनिधि आयतुल्लाह अब्दुल मजीद हकीम इलाही ने विशेष रूप से भाग लिया। सभा में विभिन्न धर्मों और संप्रदायों के उलमा और बुद्धिजीवी उपस्थित रहे। बड़ा इमामबाड़ा आयतुल्लाह ख़ामेनई के अक़ीदत मंदों से खचाखच भरा हुआ था, जिसमें सभी विचारधाराओं के लोग शामिल थे। सभा में शामिल सभी वक्ताओं ने ईरान के साथ एकजुटता व्यक्त की और अमेरिका और इज़राइल के हमलों की निंदा की। सभा में अमेरिका और इज़राइल के खिलाफ नारे भी लगाए गए। सभा में मनाब की शहीद मासूम बच्चियों, ग़ाज़ा के शहीद बच्चों और शहीद पत्रकारों की याद में एक प्रदर्शनी भी लगाई गई थी। आयतुल्लाह ख़ामेनई की शहादत की याद में रक्तदान शिविर भी लगाया गया था। यह सभा मोमिनीन-ए-लखनऊ, अंजुमन हाय मातमी और उलमा-ए-कराम की ओर से मजलिसे उलमा-ए-हिंद के ज़ेरे इंतेज़ाम आयोजित की गई।

सभा की शुरुआत कारी आकाई ज़ियाई निया ने क़ुरआन शरीफ़ की तिलावत से की। इसके बाद नियमित कार्यक्रम आरंभ हुआ।

मौलाना इश्तियाक अहमद अंसारी ने अपनी तकरीर में इज़राइली और अमेरिकी हमले में शहीद हुई मनाब स्कूल की बच्चियों को श्रद्धांजलि देते हुए कहा कि जो लोग मासूम बच्चों का मांस खाते हैं, वे कभी मासूम बच्चों पर दया नहीं कर सकते। उन्होंने कहा कि यह युद्ध शिया-सुन्नी का नहीं बल्कि हक़ और बातिल का युद्ध है।

मुफ्ती नूरुलऐन मिस्बाही बहराइची ने कहा कि हम आयतुल्लाह ख़ामेनई के संकल्प और दूरदर्शिता को सलाम करते हैं। उन्होंने अपनी शहादत देकर ज़ालिमों और आतंकवादियों को बेनकाब कर दिया।
सिख समाज के प्रतिनिधि प्रीतिपाल सिंह सलूजा ने कहा कि ईरान ने हमेशा भारत का समर्थन किया और हमें रियायती दर पर तेल और गैस दी, लेकिन हमारी सरकार ने अमेरिका से तेल लेना शुरू कर दिया और हम पर अतिरिक्त शुल्क भी लगा दिया गया। उन्होंने कहा कि हम ट्रंप और नेतन्याहू की नीतियों का समर्थन नहीं कर सकते। उन्होंने आयतुल्लाह ख़ामेनई की शहादत और दृढ़ संकल्प को सलाम किया।
मजलिसे इत्तेहादुल मुस्लिमीन के प्रवक्ता आसिम वकार ने कहा कि मुसलमानों में कार्य क्षमता और चिंतन शक्ति समाप्त हो चुकी है, इसलिए हम पतन का शिकार हैं। उन्होंने कहा कि अमेरिका और इज़राइल की एजेंसियां ये दुष्प्रचार कर रही हैं कि ईरान शिया देश है जो सुन्नी देशों पर हमला कर रहा है, जबकि यह युद्ध हक़ और बातिल के बीच का है।
स्वामी सारंग ने अपने भाषण में ईरान का समर्थन करते हुए कहा कि ईरान की क़ौम करबला की क़ौम है उसे पराजित नहीं किया जा सकता।
रामानंद फाउंडेशन के अध्यक्ष महाराज आनंद नारायण ने कहा कि ईरान अपनी आत्मरक्षा की लड़ाई लड़ रहा है। ईरान ने किसी देश पर हमला नहीं किया बल्कि उस पर हमला किया गया है, इसलिए उसे आत्मरक्षा का अधिकार है। उन्होंने आयतुल्लाह ख़ामेनई की शहादत को सलाम करते हुए लखनऊ के लोगों के जज़्बे की भी सराहना की।
कानपुर से आए धनी राम बोध ने ‘पैंथर दलित समाज’ की ओर से आयतुल्लाह ख़ामेनई को श्रद्धांजलि अर्पित की और कहा कि ईरान ने दुनिया को ये बता दिया कि हम न तो स्वयं किसी पर अत्याचार करते हैं और न ही उसे सहन करते हैं।
पास्टर संजय अलाइन ने भी ईरान के प्रति एकजुटता व्यक्त की और ट्रंप के आतंकवादी हमलों की निंदा की। उन्होंने कहा, “हम ईरान पर अमेरिका के हमले की निंदा करते हैं और ईरान के प्रति अपने समर्थन की घोषणा करते हैं।”
हाजी सलीस अंसारी ने कहा कि ईरान को ज़ालिम ताक़तें हरा नहीं सकती क्योंकि ईरान हक़ की लड़ाई लड़ रहा है। उन्होंने कहा कि यह सभी मतभेदों को भुला देने का समय है। जब तक हम एकजुट नहीं होंगे कामयाब नहीं हो सकते।
मौलाना जहांगीर आलम क़ासमी ने कहा कि हमें एकजुट होकर अत्याचारियों का मुकाबला करना चाहिए। उन्होंने कहा कि अगर मुसलमान आपस में लड़ते रहेंगे, तो दुश्मन उन पर हावी होते रहेंगे।
कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष अजय राय ने कहा कि हम आज एक बहादुर शख़्सियत को श्रद्धांजलि देने के लिए एकत्र हुए हैं जिन्हे पूरी दुनिया उनकी बहादुरी के लिए याद कर रही है। जिसने दुनिया की महाशक्तियों को अपनी जूती की नोक पर रखा। उन्होंने कहा कि भारत सबका है और ऐसे बहादुरों को सलाम करता है।
पूर्व IAS अधिकारी अनीस अंसारी ने कहा कि हिंदुस्तान के सभी लोग और राजनीतिक दल ईरान के साथ खड़े हैं, सिवाय कुछ ऐसे लोगों के जो चरमपंथी संगठनों से जुड़े हैं। उन्होंने कहा कि हिंदुस्तान में जो लोग ईरान का समर्थन कर रहे हैं, वे सभी मुसलमान नहीं हैं, मगर वो हक़ का समर्थन कर रहे हैं।
लखनऊ विश्वविद्यालय के पूर्व प्रोफेसर डॉ. रमेश दीक्षित ने कहा कि हम आयतुल्लाह ख़ामेनई और मानवता के लिए बलिदान देने वाले सभी शहीदों को श्रद्धांजलि देते हैं। यह न्याय और सत्य की लड़ाई है, जिसका समर्थन करना चाहिए।
मौलाना बाबर अशरफ किछौछवी ने कहा कि हुसैनी कभी यज़ीदी ताकतों से नहीं डरते। उन्होंने कहा कि जब तक मुसलमान अहलेबैत की मोहब्बत पर एकजुट नहीं होंगे तब तक उन्हें सफलता नहीं मिलेगी।
सामाजिक कार्यकर्ता संदीप पांडे ने कहा कि अमेरिका और इज़राइल ने पिछले कुछ वर्षों में हजारों निर्दोष लोगों की हत्या की, जिस पर दुनिया चुप रही। उन्होंने कहा कि ईरान में शिक्षा का प्रतिशत बहुत अधिक है और मजबूत नेतृत्व वाली कौम को कोई ताक़त पराजित नहीं कर सकती।
मजलिसे उलमा-ए-हिंद के महासचिव मौलाना कल्बे जवाद नक़वी ने अपने संबोधन में सभी मेहमानों और प्रतिभागियों का धन्यवाद किया। उन्होंने कहा कि ईरान ने ज़ालिमों की बैअत स्वीकार नहीं की, इसलिए उस पर हमले किए जा रहे हैं। उन्होंने कहा कि अरब देश अमेरिका और इज़राइल के गुलाम बन चुके हैं।उन्होंने कहा कि मुहम्मद बिन सलमान की मौजूदगी में अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने कई बार उसको अपमानित किया और अभद्र भाषा का इस्तेमाल भी किया, लेकिन मुहम्मद बिन सलमान ने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी, जिससे उनकी गुलामी का अंदाज़ा लगाया जा सकता है। उन्होंने कहा कि ये ख़ादिमीने हरमैन शरीफैन नहीं बल्कि अमेरिका और इज़राइल के सेवक हैं। मौलाना ने कहा कि ट्रंप की अभद्र भाषा यह बताती है कि वो युद्ध हार चूका हैं। विजेता कभी गालियां नहीं देता, बल्कि पराजित व्यक्ति ही गालियां देता है। उन्होंने कहा कि ट्रंप आज का नमरूद है और जो अंजाम पहले नमरूद का हुआ था वही आज के नमरूद का भी होगा। उन्होंने कहा कि कश्मीर और अन्य क्षेत्रों में जिन युवाओं को रहबर-ए-इंक़लाब के समर्थन के जुर्म में गिरफ्तार किया गया है, उन्हें तुरंत रिहा किया जाये। उन्होंने कहा कि यदि हिंदुस्तान के लोग बिना किसी धार्मिक भेदभाव के ईरान का समर्थन न करते, तो तेल और गैस की आपूर्ति बंद हो जाती। उन्होंने कहा कि यदि हिंदुस्तानी जहाज़ होर्मुज़ स्ट्रेट से गुज़र रहे हैं तो इसमें सरकार का नहीं बल्कि जनता के समर्थन का योगदान है। उन्होंने कहा कि जो लोग हिंदुस्तान में हिंदू-मुस्लिम के बीच नफरत फैला रहे हैं उन्हें शर्म आनी चाहिए, क्योंकि उनके घरों के चूल्हे भी मुस्लिम देशों की वजह से जल रहे हैं। मौलाना ने आगे कहा कि हिंदुस्तान का हिंदू और मुसलमान अब नफरत फैलाने वालों की मंशा को समझ चुका है, इसलिए ईरान के साथ युद्ध के समय बिना भेदभाव के जनता ने ईरान का समर्थन किया। मौलाना ने रहबर-ए-इंक़लाबे इस्लामी की शहादत पर सरकार की ओर से शोक संदेश जारी न किए जाने की भी निंदा की।
अंत में मजलिस को ख़िताब करते हुए अयातुल्लाह ख़ामेनई के प्रतिनिधि आयतुल्लाह अब्दुल मजीद हकीम इलाही ने कहा कि इस कार्यक्रम में विभिन्न धर्मों और संप्रदायों के लोग मौजूद हैं, जो इस बात का प्रमाण है कि हिंदुस्तान की जनता ईरान के साथ है। उन्होंने ईरान के समर्थन के लिए पूरे भारत की जनता का दिल से धन्यवाद किया। उन्होंने कहा कि लखनऊ हमेशा से ज्ञान और तहज़ीब का केंद्र रहा है और आज भी है। इस शहर का इतिहास महान और गौरवशाली रहा है। यहां अनेक ऐतिहासिक और शैक्षिक कार्य संपन्न हुए हैं। उन्होंने कहा कि रहबर-ए-इंक़लाबे इस्लामी की शहादत के बाद जिस तरह लखनऊ के लोगों ने बिना किसी भेदभाव के ईरान के साथ एकजुटता और समर्थन व्यक्त किया वो बेमिसाल था, जिसके लिए मैं इस शहर के लोगों का धन्यवाद करता हूं। उन्होंने आगे कहा कि आयतुल्लाह ख़ामेनई अपने विचारों के आधार पर समय और स्थान की सीमाओं से आज़ाद हो चुके हैं और अब उनका व्यक्तित्व वैश्विक बन चुका है। उन्होंने कहा कि यदि कोई अमरता प्राप्त करना चाहता है तो उसे उस विचार से जुड़ना चाहिए जो समय और स्थान की सीमाओं में बंधा न हो। उन्होंने कहा कि आयतुल्लाह ख़ामेनई एक बेहतरीन कवि और महान विद्वान थे, मगर उन्होंने कभी इसका इज़हार नहीं किया। उन्होंने कहा कि आयतुल्लाह ख़ामेनई का पूरा जीवन मानवता की भलाई और कल्याण में बीता। उन्होंने दुनिया के मज़लूमों को कभी अकेला नहीं छोड़ा। उन्होंने यह भी कहा कि आयतुल्लाह ख़ामेनई ने सादा जीवन व्यतीत किया। उनका पहनावा, भोजन और पूरा रहन-सहन अत्यंत साधारण था। उन्होंने कहा कि उनके पुत्र आयतुल्लाह मुजतबा ख़ामेनई भी इन्हीं गुणों के धनी हैं। अंत में उन्होंने कहा कि जैसे-जैसे युद्ध बढ़ रहा है, ईरान की शक्ति दुनिया के सामने और स्पष्ट हो रही है। उन्होंने करबला के मैदान में इमाम हुसैन (अ.स) की शहादत के वाक़िये का उल्लेख करते हुए अपनी तक़रीर का समापन किया। तक़रीर के बाद उन्होंने विश्व में शांति और स्थिरता के लिए दुआ भी करवाई। इस तक़रीर का अनुवाद मौलाना तक़ी हैदर नक़वी ने किया।

सभा में टीले वाली मस्जिद के इमाम मौलाना फ़ज़्ले मनान रहमानी, मौलाना जैनुल हैदर अल्वी काकोरवी, समाजवादी पार्टी के सदस्य मुहम्मद इबाद, श्रीनगर कश्मीर से आए मौलाना मकबूल हुसैन जू ने भी सभा को संबोधित किया। मौलाना साबिर अली इमरानी और देवा शरीफ मस्जिद के इमाम मौलाना आजम अली वारसी ने मनज़ूम नज़राने अक़ीदत पेश किया। सभा का संचालन आदिल फ़राज़ ने किया।

सभा में सभी वक्ताओं ने अमेरिका और इज़राइल के हमलों की निंदा की और ईरान के प्रति समर्थन व्यक्त किया।
सभा में बड़ी संख्या में उलमा और बुद्धिजीवी उपस्थित रहे। विशेष रूप से जनाब डॉ. यासूब अब्बास, मौलाना सैफ अब्बास, मौलाना अख्तर अब्बास जौन, मौलाना मोहम्मद मियां आबिदी, मौलाना अली अब्बास खान, मौलाना रज़ा इमाम, सरदार सुरेंद्र पाल सिंह (सिख गुरुद्वारा कमेटी के सदस्य), पीरज़ादा शेख नासिर अली मीनाई, मौलाना हसनैन वारसी इलाहाबाद, सरदार सुरेंद्र सिंह बप्पी, मौलाना तनवीर अब्बास, मौलाना हामिद हुसैन कानपुर, मौलाना अलमदार हुसैन कानपुर, मौलाना अज़हर अब्बास कानपुर, मौलाना अनवर कानपुर, मौलाना शबाब हैदर सिरसी, मौलाना सक़लैन बाक़री, मौलाना मिर्ज़ा जाफ़र अब्बास, मौलाना मिर्ज़ा रज़ा अब्बास, मौलाना रज़ा हुसैन, मौलाना निसार अहमद ज़ैनपुरी, मौलाना आलम मेहदी ज़ैदपुरी, मौलाना तसनीम मेहदी, मौलाना अनवर हुसैन इटावा, मौलाना मुमताज़ जाफ़र, मौलाना फ़िरोज़ अली बनारसी, मौलाना अली मुहज़्ज़ब ख़िरद, मौलाना क़मरुल हसन, मौलाना सिराज हुसैन, डॉ. अरशद जाफ़री, मौलाना इफ्तिखार इंक़लाबी, मौलाना हैदर अब्बास रिज़वी, मौलाना सईदुल हसन, मौलाना मकातिब अली खान, मौलाना अली हाशिम आबिदी, मौलाना मुशाहिद आलम, मौलाना शम्सुल हसन, मौलाना तहज़ीबुल हसन, मौलाना मोहम्मद अली, मौलाना शाहनवाज़ हैदर, मौलाना मोहम्मद मूसा, मौलाना गुलाम रज़ा, डॉ. हैदर मेहदी, मौलाना मूसा रज़ा, मौलाना फ़ैज़ अब्बास, मौलाना एजाज़ हैदर, डॉ. कल्बे सिब्तैन नूरी, मौलाना एहतेशामुल हसन,मौलाना एहतेशाम अब्बास ज़ैदी, मौलाना शबाहत हुसैन, मौलाना फिरोज़ हुसैन, मौलाना नज़र अब्बास सहित अन्य उलमा, विद्वान, मदरसों के छात्र-छात्राएं और शहर की सम्मानित हस्तियां भी शामिल थीं।



