लखनऊ । अमीर-उल-मोमेनीन हजरत अली (अ.स.) को जरबत (तलवार) मारे जाने की याद में सोमवार को तड़के बड़ी अकीदत के साथ गिलीम के ताबूत का जुलूस निकाला गया। जिसमें में हजारों पुरूषों के अलावा पर्दानशीन महिलाओं व बच्चों ने काले लिबास पहने शिरकत की। मस्जिदे कूफा काजमैन से निकाला गया यह ताबूत इमामबाड़ा हकीम सैयद मोहम्मद तकी ले जाया गया। जुलूस को निकलवाने के लिए सुरक्षा के कड़े इंतजाम किये गये थे। जुलूस से पूर्व सुबह 4.55 बजे मस्जिद में कारी ताहिर जाफरी ने फज्र की अजान दी। अजान होते ही मस्जिद परिसर नमाजियों से खचा-खच भर गया। मौलाना जहीर अहमद ने नमाज अदा करायी आैर मौलाना मुत्तकी जैदी ने मजलिस को खिताब किया। उन्होंने जब 19वीं रमजान को हजरत अली (अ.स.) पर सुबह की नमाज के दौरान अब्दुर्रहमान इब्ने मुल्जिम ने जहर से बुझी तलवार से वार करने का मंजर बयान किया तो अजादार रोने लगे। मजलिस के बाद जैसे ही कंबल में लिपटा ताबूत बाहर आया तो अजादार ताबूत का बोसा लेने लगे। अब यह ताबूत अपनी मंजिल के लिए बढ़ने लगा। जुलूस के आगे ‘जुलूसे शबीह ताबूत” का काला बैनर चल रहा था। मर्सियाख्वानी और आंसुओं के साथ यह जुलूस मंसूर नगर, गिरधारी सिंह इंटर कालेज, बिल्लौचपुरा व नक्खास होते हुए पाटानाला के पास पहुंचा। जहां पुरुषों ने ताबूत महिलाओं को सौंप दिया जिसे वह इमामबाड़ा हकीम सैयद मोहम्मद तकी ले गयी।जहां दिनभर अजादारों ने की जुलूस की जियारत। जुलूस के साथ हजरत अब्बास (अ.स.) के अलम भी थे। रास्ते के दोनों ओर ताबूत की जियारत करने वालों का हुजूम था। ताबूत देख हर आंख से आंसू जारी हो जाते थे। इसके बाद अलविदायी मजलिस को मौलाना मीसम जैदी ने खिताब किया। मजलिस खत्म होते ही सीनाजनी के साथ हैदर मौला-या अली मौला की सदाएं गूंजने लगी। इसके बाद नदीम नजफी ने जियारत पढ़ायी।



