लखनऊ। नवासे रसूल हजरत इमाम हुसैन और उनके बहत्तर साथियों की याद में मजलिस और मातम का सिलसिला राजधानी में लगातार जारी है। इसी कड़ी में गुरुवार देर रात अमीनाबाद स्थित ‘मस्जिद पड़ाईन’ में एक मजलिस का आयोजन किया गया, जिसमें बड़ी संख्या में अज़ादारों ने शिरकत की।
‘ख़त्म-ए-नबूवत’ विषय पर हुआ ख़िताब
मजलिस को संबोधित करते हुए मशहूर आलीम-ए-दीन मौलाना मीसम जैदी ने ‘ख़त्म-ए-नबूवत’ (पैगंबरी का समापन) विषय पर विशेष व्याख्यान दिया। उन्होंने हजरत रसूल-ए-खुदा की फजीलत और अज़मत पर रोशनी डालते हुए कहा कि अल्लाह ने पवित्र कुरान में पैगंबर हज़रत मुहम्मद (स.अ.व.व.) को कई अल्काब (पदवियों) और मुक़द्दस नामों से नवाज़ा है।
हज़रत अबू तालिब के एहसानों का ज़िक्र
मौलाना मीसम जैदी ने पैगंबर इस्लाम की परवरिश में उनके चचा हज़रत अबू तालिब के योगदान को रेखांकित किया। उन्होंने कहा हज़रत मुहम्मद (स.) वह अज़ीम हस्ती हैं जिन्हें हज़रत अबू तालिब ने पाला। हज़रत अबू तालिब जो खुद खाते थे, वही पैगंबर को खिलाते थे; जहाँ खुद सोते थे, वहीं पैगंबर को सुलाते थे और वे जहाँ भी जाते थे, पैगंबर को साए की तरह अपने साथ रखते थे।”
शहादत का मंज़र सुन रो पड़े अज़ादार
मजलिस के दूसरे हिस्से में मौलाना ने कर्बला के मैदान में हज़रत इमाम हुसैन की शहादत के बाद उनके बीमार बेटे इमाम ज़ैनुल आब्दीन पर ढाए गए ज़ुल्मों और मुसीबतों का ज़िक्र किया। इसके साथ ही जब हज़रत अब्बास की शहादत का दर्दनाक मंज़र बयान किया गया, तो पूरी मजलिस में कोहराम मच गया और अज़ादार फूट-फूट कर रोने लगे।
नौहाख्वानी और ज़ियारत
मजलिस के समापन के बाद अंजुमन शब्बीरिया (शीश महल) के नौहाख्वानों ने पुरदर्द आवाज़ में नौहाख्वानी और सीनाज़नी की। मजलिस के आख़िर में मोमीनिन के लिए ताबूत, अलम और ज़ुल्जनाह (इमाम हुसैन के वफ़ादार घोड़े का शबीह) की ज़ियारत कराई गई।



