गाजियाबाद। आबादी के लगातार विस्तार के साथ जंगल और इंसानी बस्तियों के बीच की दूरी कम होती जा रही है। इसका असर वन्यजीवों की गतिविधियों पर भी दिखाई दे रहा है। प्राकृतिक आवास सिकुड़ने और मानवीय गतिविधियां बढ़ने के कारण सांप, तेंदुआ, पक्षियों समेत कई तरह के वन्यजीव अक्सर आबादी वाले इलाकों में पहुंच जाते हैं। ऐसे मामलों में लोगों की सुरक्षा के साथ-साथ वन्यजीवों को सुरक्षित बचाना भी वन विभाग के सामने बड़ी जिम्मेदारी होती है। इसी के तहत गाजियाबाद में वन विभाग की रेस्क्यू टीम लगातार सक्रिय है।
वन विभाग के अनुसार, सितंबर 2025 से सितंबर 2026 के बीच जिले और आसपास के क्षेत्रों में कुल 574 वन्यजीवों का रेस्क्यू किया गया। रेस्क्यू के बाद इन वन्यजीवों को सुरक्षित स्थानों पर ले जाकर उनके प्राकृतिक आवास में छोड़ा गया। विभाग की टीम को अलग-अलग इलाकों से वन्यजीवों के आबादी में पहुंचने की सूचना मिलती रही, जिसके बाद टीम ने मौके पर पहुंचकर स्थिति के अनुसार कार्रवाई की।
वन्यजीवों के आबादी में पहुंचने के मामलों में सबसे ज्यादा चुनौती उस समय सामने आती है, जब किसी घर, दुकान, स्कूल, खेत या अन्य सार्वजनिक स्थान पर कोई जंगली जीव दिखाई देता है। ऐसे में स्थानीय लोगों में स्वाभाविक रूप से डर और चिंता का माहौल बन जाता है। कई बार बड़ी संख्या में लोग मौके पर एकत्र हो जाते हैं, जिससे वन्यजीव और इंसान दोनों के लिए खतरा बढ़ सकता है। ऐसे मामलों में वन विभाग की रेस्क्यू टीम लोगों को मौके से दूर रखने के साथ वन्यजीव को सुरक्षित तरीके से पकड़ने की कोशिश करती है।
गाजियाबाद जैसे तेजी से विकसित हो रहे क्षेत्र में यह चुनौती लगातार बढ़ रही है। शहर और आसपास के इलाकों में आवासीय कॉलोनियों, सड़कों, व्यावसायिक प्रतिष्ठानों और अन्य निर्माण गतिविधियों का विस्तार हुआ है। इसके साथ ही पहले से मौजूद हरित क्षेत्रों और खुले स्थानों पर भी मानवीय गतिविधियां बढ़ी हैं। वन्यजीवों के प्राकृतिक आवास और उनके विचरण वाले क्षेत्रों के आसपास आबादी बढ़ने से कई बार उनका सामना सीधे इंसानों से हो जाता है।
विशेष रूप से सांपों के आबादी में निकलने की घटनाएं बरसात और गर्मी के मौसम में अधिक दिखाई देती हैं। खेतों, खाली प्लॉट, झाड़ियों और घरों के आसपास सांप दिखाई देने पर लोग तुरंत रेस्क्यू टीम या संबंधित विभाग को सूचना देते हैं। कई मामलों में सांप घरों के अंदर, वाहनों के आसपास या अन्य ऐसी जगहों पर पहुंच जाते हैं जहां उनके कारण लोगों में भय पैदा हो जाता है। वन विभाग की टीम ऐसे मामलों में सांप को सुरक्षित तरीके से रेस्क्यू कर उसे उपयुक्त प्राकृतिक स्थान पर छोड़ती है।
इसी तरह पक्षियों के घायल होने, तारों या अन्य स्थानों में फंसने अथवा आबादी में भटककर पहुंचने पर भी रेस्क्यू की आवश्यकता पड़ती है। घायल या कमजोर वन्यजीवों को सुरक्षित निकालना केवल उन्हें पकड़ने तक सीमित नहीं होता, बल्कि उनकी स्थिति के अनुसार देखभाल और फिर उन्हें उपयुक्त प्राकृतिक वातावरण में छोड़ना भी महत्वपूर्ण होता है।
तेंदुए जैसे बड़े वन्यजीवों के आबादी वाले क्षेत्रों में पहुंचने पर चुनौती और बढ़ जाती है। ऐसे मामलों में लोगों की भीड़ को नियंत्रित करना, वन्यजीव की गतिविधियों पर नजर रखना और उसे सुरक्षित तरीके से रेस्क्यू करना जरूरी होता है। किसी बड़े वन्यजीव के दिखाई देने की सूचना मिलने पर स्थानीय स्तर पर अफवाहें और भय भी तेजी से फैल सकते हैं। इसलिए वन विभाग की टीम के लिए मौके पर पहुंचकर स्थिति का आकलन करना और लोगों को जागरूक करना भी रेस्क्यू अभियान का महत्वपूर्ण हिस्सा होता है।
वन्यजीव विशेषज्ञों के अनुसार, मानव और वन्यजीवों के बीच बढ़ता संपर्क कई कारणों से जुड़ा है। जंगलों और प्राकृतिक क्षेत्रों के आसपास विकास कार्य बढ़ने के साथ वन्यजीवों के आवागमन के रास्ते प्रभावित होते हैं। भोजन और पानी की तलाश में कई जीव आबादी के नजदीक पहुंच जाते हैं। कई बार प्राकृतिक आवास से बाहर निकलने के बाद उन्हें वापस सुरक्षित क्षेत्र में पहुंचाने के लिए रेस्क्यू टीम की मदद लेनी पड़ती है।
574 वन्यजीवों का रेस्क्यू इस बात का संकेत है कि वन विभाग को सालभर लगातार ऐसे मामलों से निपटना पड़ता है। रेस्क्यू टीम को अलग-अलग परिस्थितियों और अलग-अलग प्रजातियों के वन्यजीवों के अनुसार कार्रवाई करनी होती है। किसी मामले में छोटा सांप होता है तो किसी मामले में पक्षी या अन्य वन्यजीव को बचाने की जरूरत पड़ती है। वहीं बड़े और संभावित रूप से खतरनाक वन्यजीवों के मामलों में विशेष सावधानी बरतनी पड़ती है।
वन विभाग की ओर से लोगों से यह भी अपेक्षा की जाती है कि आबादी वाले क्षेत्र में किसी वन्यजीव के दिखाई देने पर खुद उसे पकड़ने या नुकसान पहुंचाने की कोशिश न करें। वन्यजीव को घेरने, उसके करीब जाने या भीड़ लगाने से स्थिति बिगड़ सकती है। ऐसे मामलों में संबंधित विभाग को सूचना देना अधिक सुरक्षित तरीका है। इससे रेस्क्यू टीम को मौके पर पहुंचकर वन्यजीव और लोगों दोनों की सुरक्षा सुनिश्चित करने का अवसर मिलता है।
वन्यजीवों को रेस्क्यू करने के बाद उन्हें प्राकृतिक आवास में छोड़ना संरक्षण की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जाता है। इससे घायल, भटके या आबादी में पहुंचे जीवों को दोबारा उनके अनुकूल वातावरण मिल सकता है। साथ ही इंसानों और वन्यजीवों के बीच टकराव की स्थिति को भी कम करने में मदद मिलती है।
गाजियाबाद में पिछले एक साल के दौरान 574 वन्यजीवों को रेस्क्यू किए जाने से यह भी स्पष्ट होता है कि शहरी विस्तार के साथ वन्यजीव संरक्षण की जिम्मेदारी लगातार महत्वपूर्ण होती जा रही है। आने वाले समय में आबादी और प्राकृतिक क्षेत्रों के बीच संतुलन बनाए रखना बड़ी चुनौती होगी। इसके लिए वन विभाग की रेस्क्यू व्यवस्था के साथ लोगों में वन्यजीवों के प्रति जागरूकता बढ़ाना भी जरूरी होगा, ताकि किसी वन्यजीव के आबादी में आने पर घबराहट के बजाय सुरक्षित और जिम्मेदार तरीके से स्थिति को संभाला जा सके।



