नई दिल्ली। मिडिल ईस्ट में जारी तनाव, अमेरिकी डॉलर और बॉन्ड यील्ड में उतार-चढ़ाव के बीच सोने की कीमतों में हाल के दिनों में तेज गिरावट देखने को मिली है। मंगलवार, 6 अक्टूबर को घरेलू बाजार में सोने की कीमतों में फिर दबाव रहा। हालांकि अलग-अलग बाजारों में सोने के भाव में कुछ अंतर दिखाई दे रहा है, लेकिन अंतरराष्ट्रीय बाजार और MCX के रुझान ने निवेशकों का ध्यान खींचा है। मौजूदा बाजार आंकड़ों के मुताबिक MCX पर सोना करीब ₹1.49 लाख प्रति 10 ग्राम के आसपास कारोबार कर रहा था।
पिछले कुछ सप्ताह सोने के लिए काफी उतार-चढ़ाव वाले रहे हैं। सितंबर के दौरान सोने की कीमतों में कई बार तेज गिरावट दर्ज की गई। 24 कैरेट सोने के घरेलू भाव के आंकड़ों पर नजर डालें तो सितंबर के मध्य में कीमत करीब ₹1.55 लाख प्रति 10 ग्राम के स्तर तक पहुंची थी। इसके बाद 24 सितंबर, 28 सितंबर और 29 सितंबर को लगातार कमजोरी देखने को मिली। 29 सितंबर को 24 कैरेट सोने का भाव करीब ₹1.46 लाख प्रति 10 ग्राम तक आ गया था।
हालांकि मंगलवार के आंकड़ों में अलग-अलग स्रोतों के बीच भाव में अंतर भी दिखाई दे रहा है। यह अंतर शहर, बाजार, समय और रेट के प्रकार के कारण हो सकता है। ज्वेलरी बाजार के रेट में GST, मेकिंग चार्ज और अन्य शुल्क भी शामिल हो सकते हैं, जबकि MCX पर वायदा कारोबार के भाव अलग होते हैं। इसलिए सोना खरीदने से पहले स्थानीय ज्वेलर का ताजा रेट जरूर देखना जरूरी है।
MCX पर सोने की कीमतों में दबाव
मल्टी कमोडिटी एक्सचेंज यानी MCX पर मंगलवार को सोने की कीमतों में कमजोरी देखने को मिली। एक रिपोर्ट के अनुसार, दोपहर के कारोबार में MCX गोल्ड करीब 0.14 फीसदी की गिरावट के साथ ₹1,49,100 प्रति 10 ग्राम के आसपास कारोबार कर रहा था। चांदी में भी करीब 0.51 फीसदी की कमजोरी दर्ज की गई।
बाजार में सोने की चाल पर अंतरराष्ट्रीय संकेतों का बड़ा असर पड़ रहा है। अमेरिका में बॉन्ड यील्ड और डॉलर की मजबूती सोने पर दबाव डालने वाले प्रमुख कारणों में शामिल हैं। आम तौर पर डॉलर मजबूत होने पर डॉलर में कीमत तय होने वाला सोना अन्य मुद्राओं में निवेशकों के लिए महंगा हो जाता है। इससे उसकी मांग पर असर पड़ सकता है।
हालांकि मंगलवार को अंतरराष्ट्रीय बाजार में तस्वीर पूरी तरह एकतरफा नहीं रही। रॉयटर्स के मुताबिक, अमेरिकी ट्रेजरी यील्ड में नरमी और डॉलर में कुछ कमजोरी से सोने को सहारा मिला और स्पॉट गोल्ड में करीब 0.4 फीसदी की बढ़त देखी गई। इससे संकेत मिलता है कि सोने का बाजार इस समय बेहद संवेदनशील दौर से गुजर रहा है और छोटी-छोटी वैश्विक घटनाओं से कीमतों में तेज उतार-चढ़ाव हो सकता है।
45 दिनों में क्यों टूटा सोने का भाव?
सोने की कीमतों में हालिया गिरावट को केवल एक कारण से जोड़कर नहीं देखा जा सकता। अंतरराष्ट्रीय बाजार में डॉलर की स्थिति, अमेरिकी ब्याज दरों को लेकर उम्मीदें, ट्रेजरी यील्ड, भू-राजनीतिक तनाव और निवेशकों की खरीदारी—ये सभी कारक मिलकर सोने की कीमत को प्रभावित कर रहे हैं।
सितंबर में सोने ने ऊंचे स्तरों से नीचे आना शुरू किया था। 18 सितंबर को 24 कैरेट सोने का भाव करीब ₹1,55,480 प्रति 10 ग्राम था। इसके बाद 23 सितंबर को यह करीब ₹1,54,228 और 24 सितंबर को करीब ₹1,51,086 रह गया। 25 सितंबर को थोड़ी रिकवरी के बाद 28 और 29 सितंबर को फिर तेज गिरावट दर्ज की गई।
यानी कुछ ही दिनों में सोने के भाव में हजारों रुपये का अंतर आया। इसी वजह से बाजार में यह चर्चा तेज हुई कि रिकॉर्ड या ऊंचे स्तरों से सोना काफी नीचे आ गया है। हालांकि इसे “क्रैश” कहने से पहले यह ध्यान रखना जरूरी है कि सोने की कीमतें अभी भी ऐतिहासिक रूप से काफी ऊंचे स्तरों के आसपास बनी हुई हैं।
मिडिल ईस्ट तनाव का भी असर
सोने को आमतौर पर सुरक्षित निवेश यानी सेफ-हेवन एसेट माना जाता है। जब दुनिया में युद्ध, राजनीतिक तनाव या आर्थिक अनिश्चितता बढ़ती है तो निवेशक अक्सर सोने की तरफ रुख करते हैं। मौजूदा समय में मिडिल ईस्ट से जुड़े तनाव के कारण वैश्विक बाजारों में अनिश्चितता बनी हुई है।
लेकिन इस बार भू-राजनीतिक तनाव के बावजूद सोने में लगातार तेजी नहीं बनी रही। इसकी एक वजह यह है कि दूसरी तरफ अमेरिकी डॉलर और बॉन्ड यील्ड जैसे कारक सोने पर दबाव डाल रहे हैं। बाजार में निवेशक केवल युद्ध या तनाव को देखकर फैसला नहीं कर रहे, बल्कि अमेरिकी मौद्रिक नीति और ब्याज दरों के संकेतों पर भी नजर रख रहे हैं।
रॉयटर्स की रिपोर्ट के अनुसार, सितंबर के कमजोर अमेरिकी रोजगार आंकड़ों के बाद अक्टूबर में फेडरल रिजर्व द्वारा ब्याज दर बढ़ाने की संभावना को लेकर बाजार की उम्मीदें कम हुई हैं। हालांकि दिसंबर की बैठक को लेकर बाजार अभी भी दर बढ़ने की संभावना देख रहा है।
फेस्टिव सीजन में खरीदारों की नजर
भारत में त्योहारी सीजन शुरू होने के साथ सोने की मांग पर भी बाजार की नजर है। नवरात्रि, दशहरा और इसके बाद आने वाले दीपावली तथा शादी के सीजन में सोने और आभूषणों की खरीद बढ़ सकती है। ऐसे में कीमतों में आई गिरावट खरीदारों के लिए महत्वपूर्ण हो जाती है।
हालांकि सोना खरीदने वाले ग्राहकों को केवल एक दिन की गिरावट देखकर जल्दबाजी में फैसला नहीं करना चाहिए। बाजार में लगातार उतार-चढ़ाव चल रहा है। एक दिन कीमत नीचे आने के बाद अगले ही दिन इसमें तेजी भी देखी जा सकती है।
6 अक्टूबर के उपलब्ध खुदरा आंकड़ों के अनुसार, 24 कैरेट सोने की कीमत अलग-अलग स्रोतों में लगभग ₹1.49 लाख से ₹1.50 लाख प्रति 10 ग्राम के आसपास दिखाई दे रही है, जबकि 22 कैरेट का भाव करीब ₹1.37 लाख से ₹1.39 लाख के बीच है। शहर और विक्रेता के अनुसार वास्तविक कीमत अलग हो सकती है।
क्या आगे भी गिर सकता है सोना?
सोने की कीमतों की आगे की दिशा को लेकर बाजार में अलग-अलग राय है। कुछ विश्लेषक डॉलर और अमेरिकी बॉन्ड यील्ड में मजबूती को सोने के लिए नकारात्मक मान रहे हैं। वहीं दूसरी तरफ वैश्विक अनिश्चितता, केंद्रीय बैंकों की खरीदारी और निवेशकों की मांग सोने को समर्थन दे सकती है।
यानी आने वाले दिनों में सोने की कीमत एक ही दिशा में चलने के बजाय काफी उतार-चढ़ाव दिखा सकती है। रॉयटर्स के अनुसार, कुछ विश्लेषक लंबी अवधि में सोने को लेकर सकारात्मक बने हुए हैं और ETF खरीदारी तथा निवेश मांग को समर्थन देने वाले कारकों के रूप में देख रहे हैं।
निवेशकों और खरीदारों के लिए क्या मायने?
सोने में निवेश करने वालों के लिए मौजूदा गिरावट को समझना जरूरी है। कीमत कम होने का मतलब यह नहीं है कि आगे भी कीमत निश्चित रूप से बढ़ेगी या घटेगी। सोने की कीमत अंतरराष्ट्रीय बाजार, डॉलर, ब्याज दरों और भू-राजनीतिक घटनाओं से प्रभावित होती है।
वहीं आभूषण खरीदने वाले ग्राहकों के लिए 22 कैरेट और 24 कैरेट के भाव में अंतर समझना भी जरूरी है। इसके अलावा ज्वेलरी की अंतिम कीमत में मेकिंग चार्ज, GST और अन्य शुल्क जुड़ते हैं। इसलिए केवल बाजार में दिख रहे प्रति 10 ग्राम भाव के आधार पर खरीदारी का बजट तय नहीं करना चाहिए।
फिलहाल 6 अक्टूबर को सोने का बाजार ऊंचे उतार-चढ़ाव के दौर में है। पिछले कुछ सप्ताह में कीमतों में आई बड़ी गिरावट ने निवेशकों और आम खरीदारों दोनों का ध्यान खींचा है। एक तरफ मिडिल ईस्ट का तनाव बाजार में अनिश्चितता बढ़ा रहा है, वहीं दूसरी तरफ डॉलर और अमेरिकी ट्रेजरी यील्ड सोने की कीमतों पर दबाव डाल रहे हैं। ऐसे में आने वाले दिनों में सोने का भाव किस दिशा में जाता है, इस पर अमेरिकी आर्थिक आंकड़ों, फेडरल रिजर्व की नीतिगत उम्मीदों और वैश्विक घटनाक्रम का असर देखने को मिलेगा।



