प्रयागराज। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कुछ अधिवक्ताओं द्वारा दूसरे वकीलों को जबरन अदालत में पेश होने से रोकने के मामले पर कड़ी नाराजगी जताई है। अदालत ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि किसी भी परिस्थिति में न्यायिक कार्यवाही को बाधित नहीं किया जा सकता। न्यायमूर्ति अरुण कुमार सिंह देशवाल ने शुक्रवार को एक जमानत अर्जी पर सुनवाई के दौरान यह टिप्पणी की। मामला राजेश की जमानत याचिका से जुड़ा है। कोर्ट ने इस प्रकरण को आगे की सुनवाई के लिए 26 नवंबर को सूचीबद्ध करने का आदेश दिया है।
हाईकोर्ट की यह टिप्पणी ऐसे समय आई है, जब कुछ अधिवक्ताओं की ओर से अन्य वकीलों को अदालत में पेश होने से कथित तौर पर जबरन रोके जाने का मामला सामने आया। अदालत ने इस तरह की गतिविधियों पर नाराजगी जताते हुए न्यायिक प्रक्रिया की स्वतंत्रता और अदालतों के कामकाज में बाधा नहीं डालने की बात कही।
वकीलों को अदालत में पेश होने से रोकने पर नाराजगी
मामले की सुनवाई के दौरान अदालत के सामने यह मुद्दा आया कि कुछ अधिवक्ता अन्य वकीलों को जबरन अदालत में पेश होने से रोक रहे हैं। इस पर न्यायमूर्ति अरुण कुमार सिंह देशवाल ने सख्त रुख अपनाया। उन्होंने कहा, ‘अदालती कार्यवाही नहीं रोकी जा सकती।’
अदालत की इस टिप्पणी का सीधा संबंध न्यायिक कामकाज को सुचारु रूप से चलाने और वकीलों को अपने मुवक्किलों की ओर से अदालत में पेश होने के अधिकार से है। किसी भी मामले में सुनवाई के लिए वकीलों की उपस्थिति और न्यायिक प्रक्रिया का आगे बढ़ना जरूरी होता है। ऐसे में यदि किसी अधिवक्ता को जबरन अदालत में आने से रोका जाता है, तो इससे संबंधित मुकदमे की सुनवाई प्रभावित हो सकती है।
हालांकि, उपलब्ध जानकारी में यह स्पष्ट नहीं किया गया है कि अधिवक्ताओं के बीच विवाद किस मुद्दे को लेकर था, किन वकीलों को रोका गया और इस संबंध में अदालत के सामने कौन-कौन से तथ्य रखे गए।
राजेश की जमानत अर्जी पर हो रही थी सुनवाई
यह टिप्पणी राजेश की जमानत अर्जी पर सुनवाई के दौरान की गई। जमानत याचिका पर विचार करते समय अदालत के सामने वकीलों को अदालत में पेश होने से रोकने का मुद्दा भी आया। इसी संदर्भ में न्यायमूर्ति ने स्पष्ट किया कि अदालत की कार्यवाही को बाधित नहीं किया जा सकता।
जमानत याचिका किसी आरोपी को मुकदमे के दौरान जेल से बाहर रहने की अनुमति देने से संबंधित होती है। इसमें अदालत मामले के तथ्यों और उपलब्ध कानूनी आधारों पर विचार करती है। इसलिए सुनवाई की प्रक्रिया का नियमित और निर्बाध रूप से चलना महत्वपूर्ण होता है।
इस मामले में अदालत ने तत्काल अंतिम निर्णय सुनाने के बजाय अगली सुनवाई के लिए 26 नवंबर की तारीख निर्धारित की है। अब निर्धारित तारीख पर जमानत अर्जी पर आगे की सुनवाई होगी।
न्यायिक प्रक्रिया में बाधा पर कोर्ट का स्पष्ट संदेश
अदालत की टिप्पणी से यह संदेश सामने आया कि वकीलों के बीच किसी भी प्रकार का मतभेद या विरोध न्यायिक कार्यवाही को रोकने का आधार नहीं बन सकता। अदालतों में हर पक्ष को अपनी बात रखने और कानूनी प्रक्रिया के तहत पैरवी करने का अवसर मिलना चाहिए।
अधिवक्ता न्याय व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा होते हैं। वे अपने मुवक्किलों का पक्ष अदालत के सामने रखते हैं और कानूनी प्रक्रिया में सहयोग करते हैं। ऐसे में किसी वकील को जबरन अदालत में पेश होने से रोकने की स्थिति न्यायिक कामकाज पर असर डाल सकती है।
किसी मुद्दे पर असहमति होने की स्थिति में उसका समाधान कानूनी और संस्थागत तरीकों से किया जाना चाहिए। अदालत में सुनवाई रोकना या किसी दूसरे अधिवक्ता को पेश होने से रोकना संबंधित मुकदमों की प्रक्रिया को प्रभावित कर सकता है। इसी संदर्भ में हाईकोर्ट ने कहा कि अदालती कार्यवाही नहीं रोकी जा सकती।
26 नवंबर को होगी अगली सुनवाई
न्यायमूर्ति अरुण कुमार सिंह देशवाल ने मामले को 26 नवंबर को फिर से सूचीबद्ध करने का आदेश दिया है। अब इस तारीख पर राजेश की जमानत अर्जी पर आगे की सुनवाई की जाएगी। फिलहाल अदालत की ओर से जमानत को लेकर कोई अंतिम फैसला सामने नहीं आया है।
अगली सुनवाई में मामले से जुड़े कानूनी पहलुओं पर विचार किया जाएगा। साथ ही अदालत में पेश होने से वकीलों को रोकने से जुड़े मुद्दे पर भी आगे की स्थिति स्पष्ट हो सकती है।
अदालतों के कामकाज की स्वतंत्रता अहम
न्यायिक व्यवस्था में अदालतों का स्वतंत्र और निर्बाध रूप से काम करना बेहद जरूरी है। मुकदमों की सुनवाई, पक्षकारों की दलीलें और न्यायिक आदेश पूरी प्रक्रिया का हिस्सा होते हैं। यदि किसी कारण से सुनवाई बाधित होती है, तो इसका असर मुकदमों के निपटारे और पक्षकारों को मिलने वाले न्याय पर पड़ सकता है।
इलाहाबाद हाईकोर्ट की मौजूदा टिप्पणी इसी बुनियादी सिद्धांत को रेखांकित करती है कि अदालत में कार्यवाही को किसी बाहरी दबाव या जबरन रोक के जरिए बाधित नहीं किया जा सकता। न्यायमूर्ति अरुण कुमार सिंह देशवाल ने राजेश की जमानत अर्जी पर सुनवाई के दौरान यह बात कही और अगली तारीख 26 नवंबर तय कर दी।
फिलहाल इस मामले में अदालत की ओर से की गई टिप्पणी और अगली सुनवाई की तारीख ही प्रमुख घटनाक्रम हैं। 26 नवंबर को होने वाली सुनवाई के बाद ही जमानत याचिका पर आगे की स्थिति स्पष्ट होगी।



