नई दिल्ली। भारतीय जनता पार्टी (BJP) के सांसद और राष्ट्रीय प्रवक्ता संबित पात्रा ने शनिवार को कांग्रेस पर निशाना साधते हुए देश में पहली वोट चोरी जवाहरलाल नेहरू के समय होने का आरोप लगाया। उन्होंने सरदार वल्लभभाई पटेल और देश के पहले प्रधानमंत्री के चयन का मुद्दा उठाते हुए दावा किया कि कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं ने सरदार पटेल को प्रधानमंत्री बनाने के पक्ष में समर्थन दिया था, लेकिन इसके बावजूद जवाहरलाल नेहरू प्रधानमंत्री बन गए। पात्रा ने इस घटनाक्रम को वोट चोरी बताते हुए कांग्रेस के राजनीतिक इतिहास पर सवाल खड़े किए।
संबित पात्रा ने यह बयान नई दिल्ली में आयोजित प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान दिया। उनका यह हमला ऐसे समय में आया है, जब विपक्षी गठबंधन INDIA ब्लॉक मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार के खिलाफ कथित चुनावी अनियमितताओं को लेकर विरोध प्रदर्शन और प्रतीकात्मक महाभियोग कार्यक्रम आयोजित कर रहा है। पात्रा ने विपक्ष के वोट चोरी संबंधी आरोपों का जवाब देते हुए कहा कि यदि देश में पहली बार वोट चोरी हुई थी, तो वह जवाहरलाल नेहरू के समय हुई थी।
सरदार पटेल और नेहरू के प्रधानमंत्री बनने का उठाया मुद्दा
संबित पात्रा ने अपने संबोधन में देश की आजादी के बाद प्रधानमंत्री पद के चयन से जुड़े घटनाक्रम का जिक्र किया। उन्होंने कहा कि कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं ने सरदार वल्लभभाई पटेल को प्रधानमंत्री बनाने के लिए समर्थन दिया था। इसके बावजूद जवाहरलाल नेहरू देश के पहले प्रधानमंत्री बन गए।
भाजपा नेता ने आरोप लगाया कि सरदार पटेल के पक्ष में आए समर्थन को नजरअंदाज किया गया और नेहरू को प्रधानमंत्री बनाया गया। उन्होंने इस पूरे घटनाक्रम को वोट चोरी करार देते हुए कहा कि कांग्रेस आज जिस वोट चोरी का मुद्दा उठा रही है, उसे अपने इतिहास पर भी नजर डालनी चाहिए।
पात्रा ने नेहरू को लेकर यह भी कहा कि वह निर्वाचित प्रधानमंत्री नहीं थे। उनके इस बयान का उद्देश्य कांग्रेस के मौजूदा राजनीतिक आरोपों का जवाब देना और विपक्ष को पुराने राजनीतिक घटनाक्रम की याद दिलाना था।
हालांकि, यह स्पष्ट करना जरूरी है कि नेहरू और पटेल के प्रधानमंत्री बनने से जुड़ा यह दावा संबित पात्रा का राजनीतिक आरोप है। 1946 में कांग्रेस के भीतर नेतृत्व चयन की प्रक्रिया और उसके आधार पर प्रधानमंत्री बनने के घटनाक्रम को लेकर इतिहास में अलग-अलग व्याख्याएं सामने आती रही हैं।
राहुल गांधी और खड़गे के वोट चोरी के आरोपों पर पलटवार
संबित पात्रा ने यह बयान कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे और राहुल गांधी की ओर से चुनावी प्रक्रिया में कथित गड़बड़ी को लेकर लगाए जा रहे आरोपों के जवाब में दिया। दरअसल, इंडिया ब्लॉक ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ प्रतीकात्मक महाभियोग कार्यक्रम आयोजित किया था। विपक्ष का आरोप है कि मतदाता सूची में अनियमितताओं के कारण बड़ी संख्या में लोगों के मतदान के अधिकार प्रभावित हो रहे हैं।
इसी मुद्दे पर प्रतिक्रिया देते हुए पात्रा ने कहा कि कांग्रेस को वोट चोरी की बात करने से पहले अपने इतिहास पर विचार करना चाहिए। उन्होंने विपक्ष के कार्यक्रम को मॉक पार्लियामेंट बताते हुए कहा कि कांग्रेस वास्तविक संसद में हंगामा करती है, सदन की कार्यवाही बाधित करती है और फिर लोकतंत्र की बात करती है।
भाजपा नेता ने विपक्ष के इस कार्यक्रम को संसद का मजाक बनाने वाला कदम बताया। उन्होंने कहा कि विपक्ष को वास्तविक संसदीय व्यवस्था में अपनी जिम्मेदारी निभानी चाहिए।
SIR को लेकर भी कांग्रेस पर साधा निशाना
प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान संबित पात्रा ने मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) का मुद्दा भी उठाया। उन्होंने कांग्रेस पर आरोप लगाया कि वह इस प्रक्रिया को लेकर लोगों के बीच भ्रम फैलाने का प्रयास कर रही है।
पात्रा ने दावा किया कि कांग्रेस के शासनकाल में भी देश में 10 बार SIR की प्रक्रिया कराई गई थी। उन्होंने विपक्ष की ओर से लगभग 13 करोड़ मतदाताओं के नाम काटे जाने संबंधी आरोपों पर सवाल उठाते हुए कहा कि यदि वास्तव में इतनी बड़ी संख्या में लोगों के नाम हटा दिए गए होते, तो देशभर में व्यापक विरोध देखने को मिलता।
उन्होंने यह भी कहा कि SIR की प्रक्रिया अभी जारी है और इसे पूरा होने से पहले ही विपक्ष चुनाव आयोग पर सवाल उठा रहा है। भाजपा नेता के मुताबिक, मतदाता सूची से नाम हटने या अंतिम सूची में नाम शामिल नहीं होने के पीछे अलग-अलग कारण हो सकते हैं। इसलिए हर मामले को वोट चोरी से जोड़ना उचित नहीं है।
पात्रा ने यह भी दावा किया कि करीब एक करोड़ ऐसे लोगों के नाम हटाए गए हैं, जो दो स्थानों पर मतदान करते थे। हालांकि, ये आंकड़े संबित पात्रा की ओर से प्रेस कॉन्फ्रेंस में पेश किए गए दावे हैं।
ASDD प्रक्रिया का भी किया जिक्र
संबित पात्रा ने SIR के दौरान इस्तेमाल होने वाली ASDD प्रक्रिया का भी उल्लेख किया। उन्होंने मतदाता सत्यापन के संदर्भ में अनुपस्थित और स्थायी रूप से स्थानांतरित हो चुके लोगों का जिक्र किया। उनके अनुसार, बूथ लेवल ऑफिसर यानी BLO मतदाताओं के पते पर जाकर सत्यापन करते हैं और निर्धारित प्रक्रिया के तहत गणना फॉर्म उपलब्ध कराते हैं।
उन्होंने कहा कि यदि किसी मतदाता के घर पर BLO तीन बार जाने के बावजूद संबंधित व्यक्ति उपलब्ध नहीं होता है, तो उसे अनुपस्थित की श्रेणी में रखा जा सकता है। इसी तरह स्थायी रूप से दूसरी जगह चले जाने वाले लोगों के मामलों का भी सत्यापन किया जाता है।
भाजपा नेता ने कहा कि मतदाता सूची को दुरुस्त करने के लिए यह प्रक्रिया जरूरी है। उन्होंने विपक्ष से सवाल किया कि मतदाता सूची में संशोधन की प्रक्रिया को बिना पूरी जानकारी के वोट चोरी का नाम क्यों दिया जा रहा है।
1946 में क्या हुआ था? समझिए नेहरू और पटेल से जुड़ा पूरा घटनाक्रम
संबित पात्रा के बयान के बाद जवाहरलाल नेहरू और सरदार वल्लभभाई पटेल के बीच प्रधानमंत्री पद को लेकर 1946 में हुए कांग्रेस के नेतृत्व चयन की प्रक्रिया भी चर्चा में आ गई है।
दरअसल, 1946 में कांग्रेस अध्यक्ष का चयन बेहद महत्वपूर्ण था, क्योंकि आजादी से पहले बनने वाली अंतरिम सरकार का नेतृत्व कांग्रेस अध्यक्ष को मिलने की संभावना थी। यही वजह थी कि उस समय कांग्रेस अध्यक्ष का पद भविष्य के प्रधानमंत्री के चयन से भी जुड़ा हुआ माना जा रहा था।
इस प्रक्रिया में देश की 15 प्रांतीय कांग्रेस समितियों की भूमिका थी। ऐतिहासिक विवरणों के मुताबिक, इनमें से 12 समितियों ने सरदार वल्लभभाई पटेल के नाम का समर्थन किया था। वहीं, जवाहरलाल नेहरू को किसी भी प्रांतीय कांग्रेस समिति ने नामित नहीं किया था।
हालांकि, महात्मा गांधी की पसंद नेहरू थे। कांग्रेस कार्यसमिति के कुछ सदस्यों के समर्थन से नेहरू का नाम सामने आया। इसके बाद गांधीजी के आग्रह पर सरदार पटेल ने अपनी दावेदारी वापस ले ली और नेहरू निर्विरोध कांग्रेस अध्यक्ष चुने गए। बाद में उन्हें अंतरिम सरकार का नेतृत्व करने का अवसर मिला।
इस ऐतिहासिक घटनाक्रम को लेकर अलग-अलग राजनीतिक और ऐतिहासिक व्याख्याएं रही हैं। इसलिए इसे सीधे तौर पर प्रधानमंत्री पद के लिए हुए मतदान में वोट चोरी कहना ऐतिहासिक प्रक्रिया का सरलीकरण होगा। उस समय कांग्रेस अध्यक्ष के चयन की प्रक्रिया हुई थी, न कि देश के नागरिकों के बीच प्रधानमंत्री पद के लिए प्रत्यक्ष मतदान।
31 अक्टूबर को सरदार पटेल की जयंती पर उठाया मुद्दा
गौरतलब है कि 31 अक्टूबर को देश में सरदार वल्लभभाई पटेल की जयंती मनाई जाती है। इस अवसर पर संबित पात्रा ने पटेल के प्रधानमंत्री नहीं बन पाने के ऐतिहासिक घटनाक्रम को मौजूदा वोट चोरी की राजनीतिक बहस से जोड़ दिया।
उन्होंने कांग्रेस पर निशाना साधते हुए कहा कि जिस पार्टी के इतिहास में वोट चोरी का उदाहरण मौजूद है, वह आज चुनावी प्रक्रिया पर सवाल उठा रही है। उनके बयान में सरदार पटेल के योगदान और प्रधानमंत्री पद से जुड़े घटनाक्रम को प्रमुखता दी गई।
इस तरह भाजपा ने विपक्ष के आरोपों का जवाब देने के लिए आजादी के समय के राजनीतिक इतिहास को मुद्दा बनाया है।
चुनाव आयोग और मतदाता सूची पर सियासी घमासान जारी
संबित पात्रा की प्रेस कॉन्फ्रेंस से स्पष्ट है कि भाजपा और विपक्ष के बीच वोट चोरी तथा मतदाता सूची के पुनरीक्षण को लेकर राजनीतिक बहस जारी है। विपक्ष जहां चुनाव आयोग की निष्पक्षता और SIR की प्रक्रिया पर सवाल उठा रहा है, वहीं भाजपा इन आरोपों को खारिज करते हुए कांग्रेस के पुराने राजनीतिक इतिहास का हवाला दे रही है।
इस पूरे विवाद में दो अलग-अलग मुद्दे सामने हैं। पहला, 1946 में कांग्रेस अध्यक्ष के चयन और नेहरू के प्रधानमंत्री बनने का ऐतिहासिक घटनाक्रम। दूसरा, वर्तमान समय में मतदाता सूची के पुनरीक्षण और चुनावी प्रक्रिया की पारदर्शिता को लेकर उठाए जा रहे सवाल।
फिलहाल संबित पात्रा के बयान ने दोनों मुद्दों को एक बार फिर राजनीतिक चर्चा के केंद्र में ला दिया है। आने वाले दिनों में कांग्रेस की ओर से इस बयान पर क्या प्रतिक्रिया दी जाती है और SIR को लेकर विपक्ष तथा भाजपा के बीच बहस किस दिशा में आगे बढ़ती है, इस पर राजनीतिक हलकों की नजर रहेगी।



