पटना। बिहार विधान परिषद चुनाव के नतीजे सामने आने के बाद राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) के दो प्रमुख सहयोगी दलों जनता दल यूनाइटेड (JDU) और भारतीय जनता पार्टी (BJP) के बीच राजनीतिक खींचतान सामने आने लगी है। चुनाव में निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में जीत दर्ज करने वाले राहुल राज के भाजपा में शामिल होने के बाद जदयू ने इस कदम पर कड़ी आपत्ति जताई है। पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष उमेश कुशवाहा ने राहुल राज को भाजपा में शामिल किए जाने की टाइमिंग और इसके औचित्य पर सवाल उठाए हैं।
बिहार में एनडीए के दोनों दल सत्ता गठबंधन का हिस्सा हैं। ऐसे में चुनाव के बाद एक निर्दलीय निर्वाचित प्रत्याशी को लेकर सहयोगी दलों के बीच असहमति सामने आना राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। जदयू की नाराजगी ने गठबंधन के भीतर आपसी समन्वय और राजनीतिक रणनीति को लेकर नई चर्चा शुरू कर दी है।
राहुल राज के भाजपा में शामिल होने पर विवाद
बिहार एमएलसी चुनाव में राहुल राज ने निर्दलीय प्रत्याशी के तौर पर जीत हासिल की थी। चुनाव परिणाम आने के बाद उनका भाजपा में शामिल होना राजनीतिक चर्चा का विषय बन गया। जदयू ने इस घटनाक्रम पर सवाल उठाते हुए भाजपा के फैसले पर अपनी असहमति जाहिर की है।
जदयू प्रदेश अध्यक्ष उमेश कुशवाहा ने इस घटनाक्रम पर प्रतिक्रिया देते हुए पूछा कि राहुल राज को भाजपा में शामिल करने की जरूरत और समय क्या था? पार्टी की आपत्ति मुख्य रूप से इसी बात को लेकर है कि चुनाव के तत्काल बाद निर्दलीय प्रत्याशी को अपने साथ जोड़ने का फैसला किस राजनीतिक परिस्थिति में लिया गया।
छह साल के निष्कासन के बाद 15 दिन में भाजपा में वापसी पर सवाल
इस पूरे विवाद की एक अहम वजह राहुल राज का भाजपा से पुराना संबंध भी है। रिपोर्टों के मुताबिक, राहुल राज पहले भाजपा से जुड़े हुए थे, लेकिन पार्टी के खिलाफ चुनाव लड़ने के कारण उन्हें छह साल के लिए निष्कासित कर दिया गया था। उन्होंने सारण शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र से निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में चुनाव लड़ा और जीत हासिल की।
चुनाव में जीत के करीब 15 दिन के भीतर उनकी भाजपा में वापसी को लेकर जदयू ने सवाल उठाए हैं। उमेश कुशवाहा का कहना है कि जब भाजपा ने अनुशासनहीनता के आधार पर किसी नेता को पार्टी से बाहर किया था, तो इतनी जल्दी उसे दोबारा शामिल करने की क्या परिस्थिति बनी? उन्होंने भाजपा के शीर्ष नेतृत्व से इस पूरे घटनाक्रम पर विचार करने की बात कही।
एनडीए की एकता का दिया हवाला
उमेश कुशवाहा ने अपने बयान में एनडीए की एकता और गठबंधन के आपसी समन्वय का भी जिक्र किया। उन्होंने कहा कि एनडीए की पहचान उसकी एकजुटता है और गठबंधन के प्रत्येक घटक दल को इस पर ध्यान देना चाहिए।
उनके बयान से साफ है कि जदयू इस घटनाक्रम को केवल भाजपा का आंतरिक मामला मानकर छोड़ने के पक्ष में नहीं है। पार्टी का मानना है कि गठबंधन में शामिल दलों के बीच राजनीतिक फैसलों को लेकर आपसी समझ और समन्वय जरूरी है।
बंशीधर ब्रजवासी का मामला भी चर्चा में
राहुल राज के अलावा तिरहुत स्नातक निर्वाचन क्षेत्र से निर्दलीय जीतने वाले बंशीधर ब्रजवासी का नाम भी इस विवाद से जुड़ा है। दोनों नवनिर्वाचित विधान परिषद सदस्यों ने भाजपा के कार्यक्रम में हिस्सा लिया था। शुरुआत में उनके भाजपा में शामिल होने की जानकारी सामने आई, लेकिन बाद में भाजपा की ओर से स्पष्ट किया गया कि दोनों ने पार्टी को समर्थन दिया है, औपचारिक सदस्यता नहीं ली है।
इस घटनाक्रम ने विवाद को और बढ़ा दिया है। निर्दलीय निर्वाचित सदस्यों के किसी राजनीतिक दल में शामिल होने और केवल समर्थन देने के बीच कानूनी अंतर को लेकर भी सवाल उठाए जा रहे हैं।
दल-बदल कानून को लेकर भी उठे सवाल
इस पूरे मामले में राष्ट्रीय जनता दल (RJD) ने भी आपत्ति जताई है। पार्टी के सांसद मनोज झा ने निर्दलीय निर्वाचित सदस्यों के भाजपा में शामिल होने पर सवाल उठाते हुए दल-बदल कानून का मुद्दा उठाया है। राजद ने विधान परिषद के सभापति के सामने दोनों सदस्यों की सदस्यता को लेकर मामला उठाने और जरूरत पड़ने पर अदालत जाने की बात कही है।
हालांकि, भाजपा की ओर से बाद में दोनों नेताओं के औपचारिक रूप से पार्टी में शामिल होने के बजाय समर्थन देने की बात कही गई। ऐसे में अब इस मामले का कानूनी और संवैधानिक पहलू भी चर्चा में है।
गठबंधन के भीतर समन्वय की परीक्षा
बिहार विधान परिषद चुनाव के बाद सामने आया यह विवाद एनडीए के भीतर आपसी तालमेल को लेकर नई बहस खड़ी कर रहा है। एक तरफ भाजपा के साथ निर्दलीय निर्वाचित सदस्यों के जुड़ने का घटनाक्रम है, तो दूसरी तरफ जदयू की ओर से उठाए गए सवाल हैं।
उमेश कुशवाहा ने भाजपा के शीर्ष नेतृत्व से इस मामले पर विचार करने की मांग की है। अब देखना होगा कि भाजपा इस नाराजगी पर क्या प्रतिक्रिया देती है और गठबंधन के भीतर इस मुद्दे का समाधान किस तरह निकाला जाता है।
फिलहाल राहुल राज की भाजपा में वापसी और बंशीधर ब्रजवासी के समर्थन को लेकर बिहार की राजनीति में चर्चा तेज है। चुनावी नतीजों के बाद शुरू हुआ यह विवाद अब एनडीए के सहयोगी दलों के बीच समन्वय और राजनीतिक संबंधों की भी परीक्षा बन गया है।



