नई दिल्ली/कोलकाता। तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के भीतर जारी सियासी संघर्ष अब चुनाव आयोग (ईसीआई) के दरवाजे तक पहुंच गया है। पार्टी के दो प्रतिद्वंद्वी गुटों के बीच ‘असली’ तृणमूल कांग्रेस होने के दावे को लेकर चुनाव आयोग ने दोनों पक्षों को नोटिस जारी कर 6 जुलाई तक अपने-अपने दावे, दस्तावेज और जवाब दाखिल करने को कहा है। आयोग का यह कदम ऐसे समय आया है जब पार्टी के नाम, चुनाव चिह्न, संगठनात्मक नियंत्रण और अधिकृत हस्ताक्षरकर्ताओं को लेकर विवाद गहरा गया है।
चुनाव आयोग ने दोनों गुटों से संगठनात्मक चुनाव, पार्टी संविधान, अधिकृत पदाधिकारियों और पार्टी के वैध नियंत्रण से जुड़े दस्तावेज प्रस्तुत करने को कहा है। आयोग द्वारा निर्धारित समयसीमा के भीतर दोनों पक्षों को अपना पक्ष रखने का अवसर दिया गया है, जिसके बाद मामले पर आगे की प्रक्रिया तय होगी।
इस विवाद के केंद्र में एक ओर ममता बनर्जी के नेतृत्व वाला गुट है, जबकि दूसरी ओर ऋतब्रत बनर्जी के नेतृत्व वाला विद्रोही गुट खुद को पार्टी का वैध प्रतिनिधि बता रहा है। विद्रोही गुट का दावा है कि संगठन के भीतर लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं का पालन नहीं किया गया और पार्टी के संचालन में संविधान की अनदेखी हुई है। इसी आधार पर उसने चुनाव आयोग से पार्टी के नाम, चुनाव चिह्न और अन्य अधिकारों पर अपना दावा पेश किया है।
वहीं ममता बनर्जी खेमे ने विद्रोही गुट के दावों को सिरे से खारिज किया है। पार्टी के वरिष्ठ नेताओं का कहना है कि ऋतब्रत बनर्जी और उनके समर्थकों को संगठन की ओर से पहले ही निष्कासित किया जा चुका है, इसलिए उनके पास तृणमूल कांग्रेस पर दावा करने का कोई वैधानिक आधार नहीं है। ममता गुट का कहना है कि चुनाव आयोग के समक्ष सभी आवश्यक दस्तावेज प्रस्तुत किए जाएंगे और पार्टी की आधिकारिक स्थिति स्पष्ट की जाएगी।
ऋतब्रत बनर्जी ने चुनाव आयोग के समक्ष पेश होकर दावा किया कि उनके साथ बड़ी संख्या में निर्वाचित प्रतिनिधि और संगठन के सदस्य हैं। उनके अनुसार, उनका गुट ही वास्तविक तृणमूल कांग्रेस का प्रतिनिधित्व करता है और इसलिए पार्टी के चुनाव चिह्न तथा संगठनात्मक नियंत्रण पर उसका अधिकार होना चाहिए।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि चुनाव आयोग का फैसला केवल संगठनात्मक विवाद तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि इसका असर पार्टी की भविष्य की राजनीतिक दिशा और चुनावी रणनीति पर भी पड़ सकता है। यदि दोनों गुट अपने-अपने दावों पर कायम रहते हैं, तो आयोग को उपलब्ध दस्तावेजों, संगठनात्मक समर्थन और कानूनी प्रावधानों के आधार पर निर्णय लेना होगा।
फिलहाल सभी की नजर 6 जुलाई की समयसीमा पर टिकी है। इसके बाद चुनाव आयोग दोनों पक्षों के दावों की समीक्षा करेगा और आवश्यक होने पर आगे की सुनवाई या अन्य कानूनी प्रक्रिया शुरू कर सकता है। आयोग का अंतिम फैसला ही तय करेगा कि आधिकारिक रूप से ‘असली’ तृणमूल कांग्रेस किसे माना जाएगा।



