लखनऊ। कर्बला में शहीद हुए पैगंबर मोहम्मद के नवासे हजरत इमाम हुसैन और उनके 71 साथियों की याद में पिछले दो महीने आठ दिनों से जारी गम का सिलसिला शनिवार को समाप्त हो गया। इस सिलसिले के अंतिम पड़ाव के रूप में राजधानी लखनऊ में पारंपरिक रूप से ऐतिहासिक ‘चुप ताजिए’ का अलविदाई जुलूस अकीदत व शांतिपूर्ण माहौल के बीच निकाला गया।
जुलूस की शुरुआत तड़के बजाजा स्थित इमामबाड़ा नाजिम साहब से हुई। इससे पूर्व आयोजित मजलिस को मौलाना यासूब अब्बास ने खिताब करते हुए कर्बला के शहीदों के मसाब और शहादत का मंजर बयान किया, जिसे सुनकर अजादार रो पड़े। मजलिस के बाद अजादार गमजदा माहौल में चुप ताजिए को लेकर रवाना हुए। यह जुलूस अकबरी गेट, नक्खास, बिल्लोचपुरा चौराहा और मंसूर नगर स्थित गिरधारी सिंह इंटर कॉलेज से होते हुए अपने तय मार्ग से रौजा-ए-काजमैन पहुंचा, जहां ताजिए को सुपुर्द-ए-खाक किया गया।
परंपरागत जुलूस और 1999 का ऐतिहासिक मुआयदा
शिया समुदाय में मुहर्रम की पहली तारीख से शुरू होने वाला यह गम का दौर 8 रबी-उल-अव्वल को चुप ताजिए के साथ पूरा होता है। वर्ष 1999 में शिया, सुन्नी और प्रशासन के बीच हुए समझौते के तहत लखनऊ में मुहर्रम के दौरान 10 प्रमुख जुलूस निकाले जाते हैं
शिया समुदाय (9 जुलूस) शाही जरीह (1 मुहर्रम), शाही मेहंदी (7 मुहर्रम), अलम फतेह फरात (8 मुहर्रम), शब-ए-आशूर (9 मुहर्रम), यौम-ए-आशूर (10 मुहर्रम), चेहल्लुम (आशूर के 40वें दिन) और चुप ताजिया (8 रबी-उल-अव्वल)। सुन्नी समुदाय (1 जुलूस) जुलूस-ए-मदहे सहाबा।
महफिलों से होगी खुशियों की शुरुआत चुप ताजिए के सुपुर्द-ए-खाक होने के साथ ही गम का दौर खत्म हो गया है। शनिवार देर रात रौजा-ए-काजमैन में महफिल-ए-मसर्रत का आयोजन किया जाएगा, जिसमें बड़ी संख्या में अकीदतमंद शामिल होकर खुशियां मनाएंगे। पूरे जुलूस मार्ग पर पुलिस और प्रशासन की ओर से सुरक्षा के कड़े इंतजाम रहे।



