नई दिल्ली। भारत ने अमेरिका से उस प्रस्तावित निर्णय पर पुनर्विचार करने का औपचारिक अनुरोध किया है, जिसके तहत कथित तौर पर जबरन श्रम (Forced Labour) से बने सामानों के आयात पर प्रभावी रोक लगाने में विफल रहने के आधार पर भारतीय उत्पादों पर 12.5 प्रतिशत अतिरिक्त टैरिफ लगाने का प्रस्ताव रखा गया है। भारत का कहना है कि वह अंतरराष्ट्रीय श्रम मानकों के प्रति पूरी तरह प्रतिबद्ध है और इस संबंध में देश में प्रभावी कानूनी व्यवस्था तथा निगरानी तंत्र पहले से लागू है। ऐसे में प्रस्तावित शुल्क न केवल तथ्यों के अनुरूप नहीं है, बल्कि दोनों देशों के मजबूत व्यापारिक संबंधों को भी प्रभावित कर सकता है।
भारत और अमेरिका के बीच पिछले कुछ वर्षों में व्यापारिक साझेदारी लगातार मजबूत हुई है। दोनों देश रक्षा, प्रौद्योगिकी, ऊर्जा, सेमीकंडक्टर, डिजिटल अर्थव्यवस्था और निवेश जैसे अनेक क्षेत्रों में सहयोग बढ़ा रहे हैं। ऐसे समय में यदि भारतीय उत्पादों पर अतिरिक्त टैरिफ लगाया जाता है, तो इसका असर द्विपक्षीय व्यापार, निर्यात और उद्योग जगत पर पड़ सकता है। यही कारण है कि भारत ने इस मुद्दे को गंभीरता से लेते हुए अमेरिकी प्रशासन से प्रस्ताव पर दोबारा विचार करने की अपील की है।
सरकारी सूत्रों के अनुसार, भारत ने अमेरिका के समक्ष स्पष्ट किया है कि देश में जबरन श्रम जैसी गतिविधियों को रोकने के लिए पर्याप्त कानूनी प्रावधान मौजूद हैं। श्रम कानूनों को लगातार मजबूत किया गया है और श्रमिकों के अधिकारों की रक्षा के लिए विभिन्न संस्थाएं सक्रिय रूप से काम कर रही हैं। भारत ने यह भी कहा है कि यदि किसी विशेष मामले को लेकर अमेरिका के पास कोई चिंता है, तो उसका समाधान संवाद और तथ्यात्मक समीक्षा के माध्यम से किया जाना चाहिए, न कि व्यापक व्यापारिक प्रतिबंधों के जरिए।
भारतीय पक्ष का मानना है कि किसी भी देश के उत्पादों पर इस प्रकार का अतिरिक्त शुल्क लगाने से पहले उसके कानूनी ढांचे, नियामकीय व्यवस्था और वास्तविक परिस्थितियों का निष्पक्ष मूल्यांकन किया जाना चाहिए। भारत ने अमेरिका को यह भी याद दिलाया है कि दोनों देशों के बीच व्यापारिक संबंध आपसी विश्वास, पारदर्शिता और नियम-आधारित सहयोग पर आधारित हैं। इसलिए किसी भी निर्णय से पहले व्यापक परामर्श आवश्यक है।
यदि प्रस्तावित 12.5 प्रतिशत टैरिफ लागू होता है, तो इसका सबसे अधिक असर उन भारतीय निर्यातकों पर पड़ सकता है जो अमेरिका को बड़े पैमाने पर वस्तुओं की आपूर्ति करते हैं। वस्त्र, परिधान, चमड़ा, हस्तशिल्प, इंजीनियरिंग उत्पाद, कृषि आधारित वस्तुएं और अन्य श्रम-प्रधान उद्योगों के लिए अमेरिकी बाजार बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है। अतिरिक्त शुल्क लगने से भारतीय उत्पाद अमेरिकी बाजार में अपेक्षाकृत महंगे हो सकते हैं, जिससे उनकी प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता प्रभावित होने की आशंका जताई जा रही है।
उद्योग जगत का भी मानना है कि भारत और अमेरिका के बीच आर्थिक संबंध केवल व्यापार तक सीमित नहीं हैं। दोनों देशों के बीच निवेश, तकनीकी सहयोग और वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला को मजबूत करने के लिए लगातार प्रयास किए जा रहे हैं। ऐसे में किसी भी प्रकार का अतिरिक्त व्यापारिक शुल्क दोनों देशों के उद्योगों और उपभोक्ताओं पर अप्रत्यक्ष प्रभाव डाल सकता है। विशेषज्ञों का कहना है कि व्यापारिक मतभेदों का समाधान बातचीत और संस्थागत तंत्र के माध्यम से निकालना अधिक प्रभावी होगा।
अर्थशास्त्रियों का कहना है कि वर्तमान वैश्विक आर्थिक परिस्थितियों में अधिकांश देश अपनी आपूर्ति श्रृंखलाओं को अधिक विश्वसनीय और विविध बनाने पर जोर दे रहे हैं। भारत भी विनिर्माण क्षेत्र को मजबूत करने और वैश्विक निवेश आकर्षित करने की दिशा में कई सुधार लागू कर चुका है। ऐसे में यदि भारतीय निर्यात पर अतिरिक्त शुल्क लगाया जाता है, तो यह वैश्विक व्यापार और निवेश के व्यापक माहौल पर भी असर डाल सकता है।
भारत ने अपने अनुरोध में इस बात पर भी जोर दिया है कि दोनों देशों के बीच लंबे समय से मजबूत रणनीतिक साझेदारी रही है। रक्षा, ऊर्जा, विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी, स्वास्थ्य, शिक्षा और डिजिटल नवाचार जैसे क्षेत्रों में सहयोग लगातार बढ़ रहा है। व्यापारिक विवादों को इन व्यापक संबंधों के संदर्भ में देखा जाना चाहिए, ताकि किसी एक मुद्दे के कारण दोनों देशों के दीर्घकालिक हित प्रभावित न हों।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि अमेरिका भारत की अपील पर सकारात्मक विचार करता है, तो यह दोनों देशों के बीच विश्वास और सहयोग को और मजबूत करेगा। वहीं, यदि प्रस्तावित टैरिफ को लागू करने की दिशा में आगे बढ़ा जाता है, तो दोनों देशों के बीच इस विषय पर विस्तृत वार्ता और संभावित समाधान की आवश्यकता और बढ़ जाएगी। हालांकि, दोनों देशों का अब तक का रिकॉर्ड बताता है कि व्यापारिक मतभेदों को बातचीत और कूटनीतिक संवाद के माध्यम से सुलझाने की परंपरा रही है।
फिलहाल भारत ने स्पष्ट कर दिया है कि वह अंतरराष्ट्रीय श्रम मानकों के पालन के प्रति प्रतिबद्ध है और इस मुद्दे पर अमेरिका के साथ रचनात्मक संवाद जारी रखना चाहता है। अब निगाहें अमेरिकी प्रशासन के अगले कदम पर टिकी हैं कि वह भारत के पुनर्विचार के अनुरोध पर क्या निर्णय लेता है। आने वाले समय में इस विषय पर दोनों देशों के बीच होने वाली बातचीत न केवल प्रस्तावित टैरिफ का भविष्य तय करेगी, बल्कि भारत-अमेरिका व्यापारिक संबंधों की आगे की दिशा भी निर्धारित कर सकती है।



