Tuesday, July 7, 2026
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इंडोनेशिया की संसद से पीएम मोदी का दुनिया को संदेश, भारत की बढ़ती ताकत और वैश्विक भूमिका को किया रेखांकित

नई दिल्ली। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इन दिनों इंडोनेशिया के आधिकारिक दौरे पर हैं, जहां उन्होंने राजधानी जकार्ता में इंडोनेशियाई संसद को संबोधित करते हुए भारत की बढ़ती वैश्विक भूमिका, लोकतांत्रिक मूल्यों और दोनों देशों के ऐतिहासिक संबंधों पर विस्तार से अपने विचार रखे। अपने संबोधन के दौरान प्रधानमंत्री ने भारत की आर्थिक प्रगति, लोकतांत्रिक परंपराओं, सांस्कृतिक विरासत और वैश्विक स्तर पर बढ़ते प्रभाव का उल्लेख करते हुए कहा कि आज का भारत केवल अपने विकास तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरी दुनिया के साथ साझेदारी और साझा प्रगति के सिद्धांत पर आगे बढ़ रहा है।

प्रधानमंत्री का यह संबोधन ऐसे समय में हुआ है जब भारत और इंडोनेशिया के बीच रणनीतिक, आर्थिक और समुद्री सहयोग लगातार मजबूत हो रहा है। हिंद-प्रशांत क्षेत्र में दोनों देशों की भूमिका लगातार महत्वपूर्ण होती जा रही है और वैश्विक भू-राजनीतिक परिस्थितियों के बीच यह यात्रा द्विपक्षीय संबंधों को नई दिशा देने वाली मानी जा रही है। जकार्ता स्थित संसद भवन में प्रधानमंत्री का गर्मजोशी से स्वागत किया गया और उनके संबोधन को दोनों देशों के संबंधों में एक महत्वपूर्ण पड़ाव के रूप में देखा गया।

अपने संबोधन की शुरुआत प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भारत और इंडोनेशिया के सदियों पुराने सांस्कृतिक और सभ्यतागत संबंधों का उल्लेख करते हुए की। उन्होंने कहा कि दोनों देशों के रिश्ते केवल कूटनीति तक सीमित नहीं हैं, बल्कि इतिहास, संस्कृति, व्यापार और साझा मूल्यों की मजबूत नींव पर आधारित हैं। उन्होंने भगवान राम, महाभारत, बौद्ध और हिंदू परंपराओं के सांस्कृतिक प्रभाव का उल्लेख करते हुए कहा कि दोनों देशों की साझी विरासत आज भी लोगों को एक-दूसरे से जोड़ती है।

प्रधानमंत्री ने कहा कि भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है और लोकतांत्रिक मूल्यों के प्रति उसकी प्रतिबद्धता लगातार मजबूत हुई है। उन्होंने भारत की आर्थिक उपलब्धियों का जिक्र करते हुए कहा कि देश तेजी से दुनिया की प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में अपनी जगह बना रहा है। डिजिटल परिवर्तन, तकनीकी नवाचार, आधार, यूपीआई, डिजिटल भुगतान व्यवस्था और स्टार्टअप इकोसिस्टम का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि भारत ने विकास का ऐसा मॉडल प्रस्तुत किया है, जिसका लाभ करोड़ों लोगों तक पहुंचा है और जिसे दुनिया भी गंभीरता से देख रही है।

प्रधानमंत्री मोदी ने अपने संबोधन में वैश्विक चुनौतियों का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि आज पूरी दुनिया आतंकवाद, जलवायु परिवर्तन, खाद्य सुरक्षा, ऊर्जा संकट और समुद्री सुरक्षा जैसी अनेक चुनौतियों का सामना कर रही है। इन समस्याओं का समाधान किसी एक देश के प्रयासों से संभव नहीं है, बल्कि इसके लिए वैश्विक सहयोग और साझा जिम्मेदारी की आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि भारत हमेशा संवाद, शांति और सहयोग के मार्ग पर विश्वास करता है तथा विश्व समुदाय के साथ मिलकर स्थायी समाधान खोजने के लिए प्रतिबद्ध है।

हिंद-प्रशांत क्षेत्र का उल्लेख करते हुए प्रधानमंत्री ने कहा कि यह क्षेत्र वैश्विक व्यापार, समुद्री संपर्क और आर्थिक विकास का प्रमुख केंद्र बन चुका है। भारत और इंडोनेशिया दोनों इस क्षेत्र में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं और स्वतंत्र, सुरक्षित तथा नियम-आधारित समुद्री व्यवस्था के पक्षधर हैं। उन्होंने कहा कि दोनों देशों का सहयोग न केवल द्विपक्षीय संबंधों को मजबूत करेगा, बल्कि पूरे क्षेत्र में स्थिरता और समृद्धि को भी बढ़ावा देगा।

प्रधानमंत्री ने दोनों देशों के बीच व्यापार और निवेश संबंधों को और मजबूत बनाने पर भी जोर दिया। उन्होंने कहा कि भारत और इंडोनेशिया के बीच आर्थिक सहयोग की अपार संभावनाएं हैं। ऊर्जा, डिजिटल तकनीक, रक्षा, समुद्री सुरक्षा, स्वास्थ्य, शिक्षा और बुनियादी ढांचा जैसे क्षेत्रों में साझेदारी को और विस्तार दिया जा सकता है। उन्होंने निजी क्षेत्र, उद्योग जगत और निवेशकों से भी दोनों देशों के बीच आर्थिक सहयोग को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाने का आह्वान किया।

अपने भाषण के दौरान प्रधानमंत्री ने भारत की युवा शक्ति, नवाचार क्षमता और तकनीकी प्रगति का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि भारत आज दुनिया के सबसे युवा देशों में शामिल है और यही युवा शक्ति देश के विकास की सबसे बड़ी ताकत है। विज्ञान, अंतरिक्ष, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, डिजिटल तकनीक और नवाचार के क्षेत्र में भारत तेजी से आगे बढ़ रहा है। उन्होंने कहा कि भारत का लक्ष्य केवल आर्थिक विकास नहीं, बल्कि मानव कल्याण और समावेशी प्रगति सुनिश्चित करना है।

प्रधानमंत्री के संबोधन के दौरान इंडोनेशियाई सांसदों ने कई अवसरों पर तालियां बजाकर उनका स्वागत किया। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह संबोधन केवल द्विपक्षीय संबंधों तक सीमित नहीं था, बल्कि इसके माध्यम से भारत ने वैश्विक मंच पर अपनी विदेश नीति, विकास मॉडल और रणनीतिक दृष्टिकोण का भी प्रभावी संदेश दिया। विशेष रूप से हिंद-प्रशांत क्षेत्र में भारत की सक्रिय भूमिका और बहुपक्षीय सहयोग की नीति को इस भाषण के प्रमुख बिंदुओं के रूप में देखा जा रहा है।

विदेश नीति के जानकारों का कहना है कि प्रधानमंत्री की यह यात्रा भारत की ‘एक्ट ईस्ट नीति’ और इंडो-पैसिफिक विजन को और मजबूती देने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है। दक्षिण-पूर्व एशिया के देशों के साथ भारत लगातार अपने संबंधों को विस्तार दे रहा है और इंडोनेशिया इस क्षेत्र में उसका प्रमुख रणनीतिक साझेदार माना जाता है। ऐसे में संसद में दिया गया यह संबोधन दोनों देशों के रिश्तों में विश्वास, सहयोग और दीर्घकालिक साझेदारी को और मजबूत करने वाला माना जा रहा है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की इंडोनेशिया यात्रा के दौरान दोनों देशों के बीच कई महत्वपूर्ण मुद्दों पर चर्चा होने की संभावना है। रक्षा सहयोग, समुद्री सुरक्षा, व्यापार, निवेश, डिजिटल अर्थव्यवस्था और सांस्कृतिक आदान-प्रदान जैसे विषयों पर दोनों पक्षों के बीच सहमति बनने की उम्मीद जताई जा रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि इस यात्रा से भारत और इंडोनेशिया के संबंधों को नई गति मिलेगी तथा हिंद-प्रशांत क्षेत्र में दोनों देशों की साझेदारी और अधिक मजबूत होगी।

जकार्ता की संसद से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का संबोधन केवल एक औपचारिक भाषण नहीं, बल्कि भारत की बदलती वैश्विक पहचान, लोकतांत्रिक मूल्यों, आर्थिक क्षमता और विश्व के साथ साझेदारी के दृष्टिकोण का व्यापक संदेश था। इस संबोधन ने एक बार फिर यह संकेत दिया कि भारत वैश्विक मंच पर अपनी भूमिका को लगातार विस्तार दे रहा है और मित्र देशों के साथ मिलकर विकास, शांति और स्थिरता की दिशा में सक्रिय योगदान देने के लिए प्रतिबद्ध है।

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