नई दिल्ली। यूक्रेन संकट और पश्चिम एशिया में जारी संघर्षों ने आधुनिक युद्ध की रणनीति में हथियारों की लागत को एक महत्वपूर्ण मुद्दा बना दिया है। लंबी दूरी से दुश्मन के ठिकानों को निशाना बनाने के लिए मिसाइलें प्रभावी हथियार मानी जाती हैं, लेकिन लंबे समय तक चलने वाले युद्ध में इनका लगातार इस्तेमाल किसी भी देश के रक्षा बजट पर भारी पड़ सकता है। इसी चुनौती के बीच दुनिया की कई वायु सेनाएं ऐसे हथियारों पर ध्यान दे रही हैं, जो अपेक्षाकृत कम लागत में दूर स्थित लक्ष्यों को निशाना बनाने की क्षमता रखते हैं। ग्लाइड बम इसी रणनीति का अहम हिस्सा बनकर उभर रहे हैं।
ग्लाइड बम ऐसे हवाई हथियार होते हैं, जिन्हें विमान से लक्ष्य की दिशा में छोड़ा जाता है। इनमें सामान्य तौर पर अलग से इंजन नहीं होता। बम के साथ लगे पंख और दिशा नियंत्रित करने वाली प्रणाली उसे विमान से दूर तक ग्लाइड करने में मदद करती है। कुछ आधुनिक प्रणालियों में नेविगेशन और मार्गदर्शन तकनीक भी शामिल होती है, जिससे हथियार को निर्धारित लक्ष्य की ओर निर्देशित किया जा सकता है। इस तकनीक के कारण विमान को लक्ष्य के ठीक ऊपर पहुंचने की जरूरत कम हो सकती है और अपेक्षाकृत कम लागत में लंबी दूरी तक हमला करने का विकल्प मिलता है।
अमेरिका और भारत दोनों इस क्षेत्र में अपनी क्षमताएं विकसित करने पर काम कर रहे हैं। अमेरिकी वायु सेना का एक्सटेंडेड रेंज अटैक म्यूनिशन (ERAM) कार्यक्रम और भारत के स्वदेशी ग्लाइड बम कार्यक्रम इस दिशा में महत्वपूर्ण माने जा रहे हैं।
अमेरिकी वायु सेना का ERAM कार्यक्रम चर्चा में
अमेरिकी वायु सेना ने अपने एक्सटेंडेड रेंज अटैक म्यूनिशन यानी ERAM कार्यक्रम के तहत कम लागत वाले लंबी दूरी के हथियारों की दिशा में काम तेज किया है। इस कार्यक्रम को लेकर एक महत्वपूर्ण घटनाक्रम 2 नवंबर 2026 को सामने आया, जब अमेरिकी वायु सेना ने ERAM के ग्लाइड संस्करण को लेकर रक्षा कंपनियों से जानकारी मांगी। इसके लिए जारी अनुरोध में 500 पाउंड श्रेणी के ऐसे हथियार की परिकल्पना की गई है, जिसमें इंजन के बिना ग्लाइड करने की क्षमता हो।
अमेरिकी वायु सेना की इस मांग में ग्लाइड बम के लिए कम से कम 10:1 का ग्लाइड अनुपात अपेक्षित है, जबकि 15:1 से अधिक अनुपात को प्राथमिकता दी गई है। इसका मतलब है कि हथियार ऊंचाई से छोड़े जाने के बाद अपनी ग्लाइड क्षमता के सहारे काफी दूरी तय कर सकेगा। इस प्रस्तावित हथियार में लगभग 105 पाउंड विस्फोटक क्षमता वाले वारहेड का भी उल्लेख किया गया है। कंपनियों से इसकी तकनीकी तैयारी और उत्पादन क्षमता से जुड़ी जानकारी मांगी गई है।
यहां एक तकनीकी अंतर समझना जरूरी है। ERAM का मूल कार्यक्रम एक एयर-लॉन्च क्रूज मिसाइल विकसित करने से जुड़ा है, जबकि नवंबर में सामने आया नया प्रस्ताव इसके ग्लाइड संस्करण को लेकर है। इसलिए पूरे ERAM कार्यक्रम को केवल बिना इंजन वाले ग्लाइड बम का कार्यक्रम कहना सही नहीं होगा। अमेरिकी वायु सेना अलग-अलग तरह के कम लागत वाले लंबी दूरी के हथियारों के विकल्प तलाश रही है।
यूक्रेन युद्ध ने दिखाई ग्लाइड बमों की उपयोगिता
यूक्रेन युद्ध में ग्लाइड बमों का इस्तेमाल आधुनिक युद्धनीति के लिहाज से काफी महत्वपूर्ण रहा है। रूस ने पुराने पारंपरिक बमों में ग्लाइड और मार्गदर्शन किट जोड़कर उन्हें अपेक्षाकृत अधिक दूरी से इस्तेमाल करने योग्य बनाया है। इस तरह के हथियारों की मदद से लड़ाकू विमान दुश्मन की वायु रक्षा प्रणाली के बेहद करीब गए बिना भी कई लक्ष्यों को निशाना बना सकते हैं।
ग्लाइड बमों की एक खासियत यह है कि इनमें पहले से मौजूद सामान्य बमों को भी कुछ तकनीकी बदलावों के बाद निर्देशित हथियार में बदला जा सकता है। इससे नए और महंगे हथियारों पर निर्भरता कम करने का विकल्प मिलता है। यूक्रेन के मोर्चे पर रूस की ओर से ऐसे हथियारों के बड़े पैमाने पर इस्तेमाल ने सैन्य विशेषज्ञों का ध्यान इस तकनीक की ओर खींचा है।
नाटो के ज्वाइंट एयर पावर कॉम्पिटेंस सेंटर के विश्लेषण के मुताबिक, रूस के ग्लाइड बम अपेक्षाकृत कम लागत, बड़े विस्फोटक भार और लंबी दूरी से हमले की क्षमता के कारण युद्धक्षेत्र में प्रभाव डाल रहे हैं। हालांकि, इन हथियारों के प्रभाव को सीमित करने के लिए वायु रक्षा और अन्य जवाबी उपाय भी विकसित किए जा रहे हैं।
भारत का स्वदेशी ग्लाइड बम ‘गौरव’
भारत भी इस तकनीक में अपनी क्षमता विकसित कर रहा है। रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (DRDO) ने स्वदेशी लॉन्ग रेंज ग्लाइड बम ‘गौरव’ विकसित किया है। यह करीब 1,000 किलोग्राम श्रेणी का ग्लाइड बम है, जिसे देश में ही डिजाइन और विकसित किया गया है।
DRDO ने 8 से 10 अप्रैल 2025 के बीच सुखोई-30 एमकेआई लड़ाकू विमान से गौरव के सफल रिलीज ट्रायल किए थे। इन परीक्षणों में हथियार को अलग-अलग स्टेशन और विभिन्न वारहेड कॉन्फिगरेशन के साथ विमान से छोड़ा गया। परीक्षणों के दौरान इसने करीब 100 किलोमीटर की दूरी तक लक्ष्य को सटीकता से निशाना बनाने की क्षमता प्रदर्शित की।
गौरव के विकास में DRDO की रिसर्च सेंटर इमारत, आर्मामेंट रिसर्च एंड डेवलपमेंट एस्टेब्लिशमेंट और इंटीग्रेटेड टेस्ट रेंज, चांदीपुर की भूमिका रही है। इसके निर्माण में निजी क्षेत्र की कंपनियों और सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यमों ने भी सहयोग किया है। इस तरह यह परियोजना स्वदेशी रक्षा तकनीक और घरेलू औद्योगिक भागीदारी का उदाहरण है।
इस हथियार का सफल परीक्षण भारतीय वायु सेना की लंबी दूरी से सटीक हमला करने की क्षमता को बढ़ाने की दिशा में महत्वपूर्ण माना गया। हालांकि, परीक्षण में सफल होना और किसी हथियार का नियमित सैन्य इस्तेमाल में शामिल होना अलग-अलग चरण हैं। गौरव के परीक्षणों को इसकी आगे की प्रक्रिया की दिशा में महत्वपूर्ण उपलब्धि माना गया है।
SAT-SAAW से भारत की क्षमता को मिल रही मजबूती
गौरव के अलावा भारत के पास सैटेलाइट स्मार्ट एंटी-एयरफील्ड वेपन यानी SAT-SAAW जैसी स्वदेशी प्रणाली भी है। यह एक प्रिसिजन गाइडेड एयर-टू-ग्राउंड ग्लाइड बम है, जिसे दुश्मन के हवाई अड्डों और उनसे जुड़े महत्वपूर्ण ठिकानों को निशाना बनाने के लिए विकसित किया गया है।
रक्षा मंत्रालय ने 23 सितंबर 2026 को भारत डायनेमिक्स लिमिटेड के साथ 160 SAT-SAAW हथियारों की खरीद के लिए 810.79 करोड़ रुपये का अनुबंध किया। यह खरीद ‘बाय इंडियन-इंडिजिनसली डिजाइन, डेवलप्ड एंड मैन्युफैक्चर्ड’ श्रेणी के तहत की गई है। मंत्रालय के अनुसार, इन हथियारों की आपूर्ति वित्त वर्ष 2027-28 से 2028-29 के बीच की जानी है।
SAT-SAAW को जगुआर, हॉक और सुखोई-30 एमकेआई जैसे विमानों से इस्तेमाल किया जा सकता है। इसमें स्वदेशी तकनीक और उप-प्रणालियों को शामिल करने पर जोर दिया गया है। रक्षा मंत्रालय के मुताबिक, इस अनुबंध के तहत हथियार में स्वदेशी सामग्री की हिस्सेदारी 60 प्रतिशत होगी। इसमें इनर्शियल मेजरमेंट यूनिट, लॉन्ग इम्पैक्ट डिले फ्यूज और ट्विन स्टोर कैरियर जैसे हिस्सों का स्वदेशीकरण भी शामिल है।
इस खरीद से भारतीय वायु सेना को स्वदेशी सटीक निर्देशित हथियारों की उपलब्धता बढ़ाने में मदद मिलेगी। साथ ही घरेलू रक्षा उद्योग और निजी कंपनियों को भी उत्पादन और तकनीकी विकास के क्षेत्र में अवसर मिलेंगे।
मिसाइल और ग्लाइड बम में क्या है अंतर?
मिसाइल और ग्लाइड बम दोनों का इस्तेमाल दूर स्थित लक्ष्यों पर हमले के लिए किया जा सकता है, लेकिन उनकी तकनीक और काम करने का तरीका अलग होता है। मिसाइल में आमतौर पर अपना इंजन होता है, जो उसे उड़ान के दौरान आगे बढ़ने की शक्ति देता है। इसके विपरीत ग्लाइड बम को विमान से छोड़े जाने के बाद उसके पंख और वायुगतिकीय संरचना आगे बढ़ने में मदद करते हैं। कई आधुनिक ग्लाइड बमों में नेविगेशन और मार्गदर्शन प्रणाली भी लगी होती है।
ग्लाइड बमों की लागत कम रखने का एक कारण यह है कि इनमें अलग से इंजन और उससे जुड़ी जटिल प्रणालियों की जरूरत नहीं होती। कई मामलों में पुराने बमों को ग्लाइड किट और मार्गदर्शन प्रणाली से लैस करके भी इस्तेमाल किया जा सकता है। इससे बड़ी संख्या में हथियार तैयार करने की संभावना बढ़ती है।
हालांकि, ग्लाइड बम हर परिस्थिति में मिसाइल का विकल्प नहीं बन सकते। उनकी दूरी और प्रभाव विमान की ऊंचाई, गति, हथियार की डिजाइन और मौसम जैसी परिस्थितियों पर निर्भर करते हैं। वहीं क्रूज और अन्य मिसाइलों में अलग तरह की उड़ान क्षमता और परिचालन विशेषताएं होती हैं। इसलिए सैन्य रणनीति में दोनों तरह के हथियारों की अपनी अलग भूमिका है।
रक्षा बजट और उत्पादन क्षमता पर भी ध्यान
लंबे समय तक चलने वाले युद्ध में हथियारों की उपलब्धता उतनी ही महत्वपूर्ण होती है, जितनी उनकी मारक क्षमता। यदि किसी देश के पास अत्याधुनिक मिसाइलें तो हैं, लेकिन उनका उत्पादन सीमित है और लागत बहुत अधिक है, तो लंबे संघर्ष के दौरान उनके भंडार पर दबाव बढ़ सकता है। इसी वजह से कई देश ऐसे हथियार विकसित करने पर ध्यान दे रहे हैं, जिन्हें कम लागत में बड़ी संख्या में तैयार किया जा सके।
रॉयटर्स की सितंबर 2026 की रिपोर्ट में भी यूक्रेन युद्ध और पश्चिम एशिया के संघर्षों के संदर्भ में महंगे हथियारों के भंडार पर पड़ने वाले दबाव का उल्लेख किया गया है। रिपोर्ट के मुताबिक, यूरोपीय देश भी कम लागत वाले हथियारों और इंटरसेप्टर के विकल्प तलाश रहे हैं, ताकि महंगे हथियारों के भंडार को हर परिस्थिति में इस्तेमाल न करना पड़े।
भारत के लिए भी यह रणनीति महत्वपूर्ण है। स्वदेशी ग्लाइड बमों का विकास और उनकी खरीद से विदेशी हथियारों पर निर्भरता घटाने में मदद मिल सकती है। इसके साथ ही देश के रक्षा उद्योग को उत्पादन बढ़ाने और नई तकनीकों में विशेषज्ञता हासिल करने का अवसर मिलेगा।
भविष्य की युद्धनीति में बढ़ेगी भूमिका
आधुनिक युद्ध में अब केवल सबसे महंगे और अत्याधुनिक हथियारों की उपलब्धता ही निर्णायक नहीं रह गई है। हथियारों की लागत, उत्पादन की गति, उपलब्धता और युद्धक्षेत्र में उनकी उपयोगिता भी उतनी ही महत्वपूर्ण हो गई है। यूक्रेन युद्ध ने दिखाया है कि अपेक्षाकृत कम लागत वाले ग्लाइड बम भी बड़े सैन्य प्रभाव पैदा कर सकते हैं।
अमेरिका का ERAM ग्लाइड संस्करण विकसित करने की दिशा में उद्योग से जानकारी मांगना और भारत का गौरव तथा SAT-SAAW जैसे स्वदेशी हथियारों पर काम करना इसी व्यापक बदलाव का हिस्सा है। हालांकि, इन हथियारों की वास्तविक उपयोगिता उनकी तकनीकी क्षमता, उत्पादन, तैनाती और युद्धक्षेत्र की परिस्थितियों पर निर्भर करेगी।
कुल मिलाकर, ग्लाइड बम महंगी मिसाइलों का पूर्ण विकल्प नहीं हैं, लेकिन लंबी दूरी से हमले के लिए एक किफायती और उपयोगी विकल्प बनकर उभर रहे हैं। आने वाले समय में वायु सेनाएं मिसाइलों, ग्लाइड बमों और अन्य निर्देशित हथियारों के बीच संतुलन बनाकर अपने हथियार भंडार को मजबूत करने पर अधिक ध्यान दे सकती हैं।



