श्रीनगर। जम्मू-कश्मीर में वर्ष 2019 के बाद हुए संवैधानिक और प्रशासनिक बदलावों का असर अब सत्ताधारी नेशनल कॉन्फ्रेंस (NC) के संगठनात्मक ढांचे पर भी दिखाई देने लगा है। पार्टी अपने संविधान में संशोधन की तैयारी कर रही है। इसके लिए संशोधन का मसौदा तैयार कर लिया गया है और अब इसे पार्टी की कार्यकारी समिति के सामने मंजूरी के लिए रखा जाएगा। पार्टी अध्यक्ष डॉ. फारूक अब्दुल्ला ने सोमवार को श्रीनगर में पार्टी नेताओं के साथ बैठक के बाद इस संबंध में जानकारी दी।
नेशनल कॉन्फ्रेंस जम्मू-कश्मीर की सबसे पुरानी प्रमुख राजनीतिक पार्टियों में शामिल है और वर्ष 1932 से क्षेत्र की राजनीति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती रही है। पार्टी के राजनीतिक एजेंडे और संगठनात्मक व्यवस्था पर जम्मू-कश्मीर की संवैधानिक स्थिति में हुए बदलावों का असर पड़ना स्वाभाविक माना जा रहा है। ऐसे में पार्टी संविधान में प्रस्तावित संशोधन को संगठन को मौजूदा राजनीतिक और प्रशासनिक परिस्थितियों के अनुरूप ढालने की दिशा में एक कदम माना जा रहा है।
फारूक अब्दुल्ला ने दी संशोधन की जानकारी
पार्टी अध्यक्ष फारूक अब्दुल्ला ने सोमवार को श्रीनगर में पार्टी की जिला कार्यसमिति से जुड़े नेताओं और विधायकों के साथ बैठक की। इस बैठक के दौरान संगठन से जुड़े विभिन्न मुद्दों पर चर्चा हुई। इसके बाद उन्होंने बताया कि पार्टी संविधान में कुछ बदलावों की आवश्यकता महसूस की गई है और इसके लिए एक मसौदा तैयार कर लिया गया है। इसे जल्द ही कार्यकारी समिति के सामने अनुमोदन के लिए पेश किया जाएगा।
फारूक अब्दुल्ला ने यह भी संकेत दिया कि संगठन के भीतर लोकतांत्रिक व्यवस्था और कामकाज को बेहतर बनाने के लिए कुछ सुधार आवश्यक हैं। हालांकि उन्होंने प्रस्तावित संशोधनों की विस्तृत जानकारी सार्वजनिक नहीं की है। इसका मतलब यह है कि पार्टी संविधान के किन-किन प्रावधानों में बदलाव किया जाएगा, यह कार्यकारी समिति के स्तर पर विचार और मंजूरी के बाद ही स्पष्ट हो सकेगा।
2019 के बाद बदली जम्मू-कश्मीर की संवैधानिक व्यवस्था
नेशनल कॉन्फ्रेंस के संविधान में बदलाव की चर्चा को जम्मू-कश्मीर की मौजूदा संवैधानिक व्यवस्था के संदर्भ में देखा जा रहा है। अगस्त 2019 में केंद्र सरकार ने जम्मू-कश्मीर से संबंधित विशेष संवैधानिक व्यवस्था में बड़े बदलाव किए थे। इसके बाद जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन अधिनियम के तहत तत्कालीन राज्य को दो केंद्र शासित प्रदेशों—जम्मू-कश्मीर और लद्दाख—में पुनर्गठित किया गया। यह व्यवस्था 31 अक्टूबर 2019 से लागू हुई।
इससे पहले जम्मू-कश्मीर के पास अपना संविधान और अलग झंडा था तथा राज्य की राजनीतिक और प्रशासनिक व्यवस्था में कई विशेष प्रावधान लागू थे। 2019 के बाद इन व्यवस्थाओं में व्यापक परिवर्तन हुआ। इसके साथ ही जम्मू-कश्मीर की प्रशासनिक संरचना भी बदल गई और क्षेत्र केंद्र शासित प्रदेश के रूप में सामने आया।
बाद में जम्मू-कश्मीर में विधानसभा चुनाव हुए और अक्टूबर 2024 में निर्वाचित विधानसभा अस्तित्व में आई। नेशनल कॉन्फ्रेंस ने इन चुनावों के बाद सरकार बनाई और उमर अब्दुल्ला मुख्यमंत्री बने। ऐसे में पार्टी अब एक ऐसी राजनीतिक और प्रशासनिक व्यवस्था में काम कर रही है, जो 2019 से पहले की व्यवस्था से अलग है।
संगठनात्मक व्यवस्था में बदलाव की जरूरत
फारूक अब्दुल्ला के अनुसार, पार्टी संगठन के भीतर कई मुद्दों पर चर्चा की गई है। संगठन को प्रभावी तरीके से चलाने और आंतरिक लोकतांत्रिक व्यवस्था को मजबूत करने के लिए कुछ सुधारों की जरूरत महसूस हुई है। इसी आधार पर संविधान में संशोधन का मसौदा तैयार किया गया है।
पार्टी के आधिकारिक संगठनात्मक ढांचे में विभिन्न स्तरों पर समितियां और पदाधिकारी शामिल हैं। नेशनल कॉन्फ्रेंस की आधिकारिक वेबसाइट भी पार्टी के संगठनात्मक नेतृत्व और उसके राजनीतिक कार्यक्रम की जानकारी देती है।
संविधान में संशोधन के बाद पार्टी के संगठनात्मक कामकाज में किस तरह का बदलाव आएगा, यह अभी स्पष्ट नहीं है। हालांकि पार्टी नेतृत्व ने इसे संगठन को मौजूदा परिस्थितियों के अनुरूप मजबूत करने की प्रक्रिया से जोड़ा है।
राज्य का दर्जा और स्वायत्तता का मुद्दा भी अहम
नेशनल कॉन्फ्रेंस की राजनीति में जम्मू-कश्मीर के विशेष राजनीतिक दर्जे और स्वायत्तता का मुद्दा लंबे समय से महत्वपूर्ण रहा है। वर्ष 2000 में जम्मू-कश्मीर विधानसभा ने स्वायत्तता से संबंधित एक प्रस्ताव भी पारित किया था। पार्टी ने बाद के वर्षों में भी इस मुद्दे को अपने राजनीतिक एजेंडे का हिस्सा बनाए रखा।
हाल के दिनों में राज्य का दर्जा बहाल करने का मुद्दा एक बार फिर जम्मू-कश्मीर की राजनीति में प्रमुखता से सामने आया है। सितंबर 2026 में जम्मू-कश्मीर विधानसभा ने पूर्ण राज्य का दर्जा बहाल करने की मांग वाला प्रस्ताव पारित किया। इस प्रस्ताव में पहले के स्वायत्तता संबंधी प्रस्तावों का भी उल्लेख किया गया।
विधानसभा में प्रस्ताव पर चर्चा के दौरान कुछ नेशनल कॉन्फ्रेंस विधायकों की ओर से अनुच्छेद 370 और 35A के संदर्भ शामिल करने के लिए संशोधन भी पेश किए गए थे। हालांकि पार्टी संविधान में प्रस्तावित बदलाव और विधानसभा के राज्यhood प्रस्ताव को एक ही प्रक्रिया मानना उचित नहीं होगा। दोनों अलग-अलग स्तर के विषय हैं—एक पार्टी के संगठनात्मक संविधान से जुड़ा है और दूसरा जम्मू-कश्मीर की संवैधानिक एवं राजनीतिक स्थिति से।
कार्यकारी समिति की मंजूरी के बाद आगे बढ़ेगा मामला
नेशनल कॉन्फ्रेंस के संविधान में प्रस्तावित संशोधन अभी अंतिम रूप से लागू नहीं हुआ है। मसौदा तैयार होने के बाद इसे कार्यकारी समिति के सामने रखा जाएगा। समिति की मंजूरी के बाद पार्टी की निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार इसे आगे बढ़ाया जाएगा।
पार्टी संविधान में संशोधन की प्रक्रिया स्वयं संगठन के नियमों के तहत चलती है। उपलब्ध पार्टी संविधान संबंधी विवरण के अनुसार, संशोधनों को संगठन के संबंधित निकायों की मंजूरी और बाद की प्रक्रिया से गुजरना होता है।
इसलिए आने वाले दिनों में कार्यकारी समिति की बैठक महत्वपूर्ण होगी। वहां यह तय होगा कि मसौदे में प्रस्तावित प्रावधानों को किस रूप में स्वीकार किया जाता है और क्या उसमें कोई और बदलाव किया जाता है।
मौजूदा राजनीतिक परिस्थितियों से जुड़ा बदलाव
जम्मू-कश्मीर की राजनीति वर्ष 2019 के बाद लगातार बदलाव के दौर से गुजर रही है। पहले संवैधानिक व्यवस्था में बदलाव हुआ, फिर राज्य का पुनर्गठन हुआ और इसके बाद विधानसभा चुनाव के माध्यम से निर्वाचित सरकार अस्तित्व में आई। अब राज्य का दर्जा बहाल करने की मांग राजनीतिक बहस के केंद्र में है।
इसी बदलते राजनीतिक वातावरण में नेशनल कॉन्फ्रेंस का अपने संविधान में संशोधन करने का फैसला संगठन के लिए महत्वपूर्ण है। पार्टी नेतृत्व का कहना है कि संगठन को मौजूदा परिस्थितियों के अनुरूप अधिक प्रभावी और लोकतांत्रिक बनाने के लिए बदलाव जरूरी हैं। हालांकि प्रस्तावित संशोधन के वास्तविक प्रावधान सामने आने के बाद ही यह स्पष्ट होगा कि पार्टी के संगठनात्मक ढांचे और नीतिगत दस्तावेज में कितना व्यापक परिवर्तन किया जा रहा है।
फिलहाल नेशनल कॉन्फ्रेंस ने संशोधन का मसौदा तैयार कर लिया है और अगला महत्वपूर्ण चरण इसे कार्यकारी समिति के सामने रखना है। समिति की मंजूरी के बाद पार्टी संविधान में बदलाव की प्रक्रिया आगे बढ़ेगी। इस पूरी प्रक्रिया पर जम्मू-कश्मीर की राजनीति में नजर रहेगी, क्योंकि नेशनल कॉन्फ्रेंस न केवल मौजूदा सत्ताधारी दल है, बल्कि क्षेत्र की राजनीति में लंबे समय से प्रभाव रखने वाला संगठन भी है।



