नई दिल्ली। दुनिया भर में जलवायु परिवर्तन की चर्चाओं के केंद्र में फिलहाल ‘अलनीनो’ छाया हुआ है। तापमान में असामान्य बढ़ोतरी से लेकर तूफान, सूखा और भारी बारिश तक, इस प्राकृतिक जलवायु घटना ने दुनिया के मौसम के पैटर्न को प्रभावित करने की आशंका बढ़ा दी है। विश्व मौसम विज्ञान संगठन (WMO) ने चेतावनी दी है कि मौजूदा अलनीनो की तीव्रता आने वाले महीनों में और बढ़ सकती है। इसके फरवरी 2027 तक बने रहने की संभावना जताई गई है। हालांकि, मौसम वैज्ञानिकों की नजर इस बात पर भी है कि जब अलनीनो कमजोर पड़ने लगेगा, तब प्रशांत महासागर में कौन-सा नया मौसमी बदलाव देखने को मिलेगा।
दरअसल, अलनीनो और ला नीना पृथ्वी की जलवायु व्यवस्था से जुड़ी दो महत्वपूर्ण प्राकृतिक घटनाएं हैं। ये दोनों घटनाएं प्रशांत महासागर के भूमध्यरेखीय हिस्से में समुद्र की सतह के तापमान में होने वाले बदलावों से संबंधित हैं। इनका प्रभाव केवल समुद्र तक सीमित नहीं रहता, बल्कि दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में तापमान, बारिश, सूखे और तूफानों की परिस्थितियों को भी प्रभावित करता है।
क्या है अलनीनो और क्यों बढ़ रही है इसकी चिंता?
अलनीनो प्रशांत महासागर के मध्य और पूर्वी भूमध्यरेखीय हिस्से में समुद्र की सतह का तापमान सामान्य से अधिक हो जाने की स्थिति है। यह प्राकृतिक जलवायु चक्र का गर्म चरण माना जाता है। सामान्य परिस्थितियों में प्रशांत महासागर के ऊपर चलने वाली व्यापारिक हवाएं गर्म पानी को पश्चिमी हिस्से की ओर धकेलती हैं, लेकिन अलनीनो के दौरान इन हवाओं की ताकत कमजोर पड़ जाती है। इससे समुद्र के मध्य और पूर्वी हिस्सों में गर्म पानी का विस्तार होने लगता है।
समुद्र की सतह के तापमान में यह बदलाव वायुमंडलीय गतिविधियों को प्रभावित करता है। इसके परिणामस्वरूप दुनिया के कई क्षेत्रों में बारिश का सामान्य पैटर्न बदल सकता है। कहीं सूखे की स्थिति बन सकती है तो कहीं सामान्य से अधिक बारिश और बाढ़ का खतरा बढ़ सकता है। इसके अलावा वैश्विक औसत तापमान पर भी इसका प्रभाव पड़ता है।
विश्व मौसम विज्ञान संगठन के 8 अक्टूबर 2026 के अपडेट के अनुसार, मौजूदा अलनीनो तेजी से मजबूत हो रहा है। संगठन ने अनुमान जताया है कि अक्टूबर से दिसंबर 2026 के दौरान प्रशांत महासागर के मध्य और पूर्वी हिस्से में समुद्र की सतह का तापमान सामान्य से लगभग 3.7 डिग्री सेल्सियस अधिक हो सकता है। यह स्तर पिछले रिकॉर्ड से भी काफी ज्यादा है।
दिसंबर में चरम पर पहुंच सकता है अलनीनो
WMO के पूर्वानुमान के मुताबिक, मौजूदा अलनीनो दिसंबर 2026 के आसपास अपनी सबसे अधिक तीव्रता पर पहुंच सकता है। इसके फरवरी 2027 तक बने रहने की संभावना लगभग 100 प्रतिशत बताई गई है। वैज्ञानिकों के अनुसार, यह घटना वर्ष 1950 के बाद दर्ज किए गए सबसे शक्तिशाली अलनीनो घटनाक्रमों में शामिल हो सकती है।
इसकी एक बड़ी वजह प्रशांत महासागर में जमा असामान्य गर्मी है। समुद्र की सतह के साथ-साथ पानी की निचली परतों में भी तापमान सामान्य से काफी अधिक दर्ज किया गया है। समुद्र में जमा यह अतिरिक्त गर्मी वातावरण और महासागर के बीच ऊर्जा के आदान-प्रदान को प्रभावित करती है।
WMO की महासचिव सेलेस्टे साउलो के मुताबिक, महासागर में पहले से मौजूद असाधारण गर्मी अलनीनो की तीव्रता बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है। इसका प्रभाव दुनिया के अलग-अलग क्षेत्रों में तापमान और बारिश के स्वरूप में बदलाव के रूप में दिखाई दे सकता है।
हालांकि, मजबूत अलनीनो का अर्थ यह नहीं है कि दुनिया के हर हिस्से में एक जैसा मौसम देखने को मिलेगा। इसका प्रभाव भौगोलिक स्थिति, मौसम और अन्य जलवायु कारकों पर निर्भर करता है।
अलनीनो कमजोर होने पर क्या होता है?
अलनीनो के कमजोर पड़ने के बाद प्रशांत महासागर में सामान्य परिस्थितियां लौट सकती हैं या इसके बाद ला नीना की स्थिति विकसित हो सकती है। हालांकि, यह बदलाव तुरंत होना जरूरी नहीं है। कई बार अलनीनो के बाद कुछ समय तक ENSO-न्यूट्रल यानी सामान्य परिस्थितियां भी बनी रहती हैं।
ला नीना को अलनीनो की विपरीत जलवायु अवस्था माना जाता है। इसमें प्रशांत महासागर के मध्य और पूर्वी भूमध्यरेखीय हिस्से में समुद्र की सतह का तापमान सामान्य से कम हो जाता है। इस दौरान व्यापारिक हवाएं अपेक्षाकृत मजबूत हो जाती हैं और गर्म पानी को पश्चिमी प्रशांत की ओर धकेलती हैं। इसके साथ ही पूर्वी प्रशांत क्षेत्र में समुद्र की गहराई से ठंडा पानी ऊपर आने की प्रक्रिया तेज हो जाती है।
इस बदलाव से समुद्र और वातावरण के बीच ऊर्जा का संतुलन प्रभावित होता है। परिणामस्वरूप दुनिया के विभिन्न हिस्सों में बारिश, तापमान और हवाओं का पैटर्न बदल सकता है।
ला नीना का मौसम पर क्या हो सकता है असर?
ला नीना के दौरान दुनिया के कई हिस्सों में अलनीनो के विपरीत मौसमी परिस्थितियां देखने को मिल सकती हैं। उदाहरण के तौर पर, दक्षिण अमेरिका के कुछ हिस्सों में बारिश कम होने की आशंका रहती है, जबकि ऑस्ट्रेलिया और दक्षिण-पूर्व एशिया के कुछ क्षेत्रों में अधिक बारिश की परिस्थितियां बन सकती हैं।
इसके अलावा अटलांटिक महासागर में उष्णकटिबंधीय तूफानों की गतिविधियों पर भी ला नीना का प्रभाव पड़ सकता है। इसके दौरान अटलांटिक क्षेत्र में तूफानों के अनुकूल परिस्थितियां विकसित होने की संभावना बढ़ सकती है। हालांकि, किसी तूफान का बनना और उसकी तीव्रता कई अन्य मौसमी परिस्थितियों पर भी निर्भर करती है।
वैज्ञानिकों के अनुसार, ला नीना के प्रभाव को किसी एक देश या महाद्वीप तक सीमित करके नहीं देखा जा सकता। यह एक व्यापक जलवायु प्रक्रिया है, जिसके प्रभाव अलग-अलग क्षेत्रों में अलग-अलग रूप में दिखाई देते हैं।
भारत के मौसम के लिए क्यों महत्वपूर्ण है यह बदलाव?
भारत जैसे कृषि प्रधान देश के लिए अलनीनो और ला नीना दोनों घटनाएं महत्वपूर्ण हैं। देश की खेती का बड़ा हिस्सा मानसूनी बारिश पर निर्भर करता है। ऐसे में प्रशांत महासागर के तापमान में होने वाला बदलाव भारतीय मानसून की परिस्थितियों को प्रभावित कर सकता है।
आमतौर पर अलनीनो की स्थिति भारतीय मानसून को कमजोर करने वाली परिस्थितियों से जुड़ी रही है। इसके कारण कुछ वर्षों में सामान्य से कम बारिश देखने को मिली है। दूसरी ओर, ला नीना के दौरान भारतीय मानसून के मजबूत रहने की संभावना बढ़ सकती है। हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि हर ला नीना वर्ष में पूरे देश में अच्छी बारिश ही होगी।
भारतीय मानसून पर हिंद महासागर की स्थिति, इंडियन ओशन डाइपोल, स्थानीय समुद्री तापमान और वायुमंडलीय परिस्थितियों का भी प्रभाव पड़ता है। इसलिए केवल अलनीनो या ला नीना के आधार पर पूरे मानसून का सटीक अनुमान लगाना उचित नहीं है।
मौजूदा समय में WMO ने हिंद महासागर में सकारात्मक इंडियन ओशन डाइपोल की स्थिति को भी महत्वपूर्ण बताया है। यह जलवायु पैटर्न हिंद महासागर के आसपास के देशों में बारिश के वितरण को प्रभावित कर सकता है।
वैज्ञानिकों की नजर 2027 की परिस्थितियों पर
मौजूदा अलनीनो की असाधारण तीव्रता को देखते हुए वैज्ञानिकों की नजर वर्ष 2027 की जलवायु परिस्थितियों पर भी बनी हुई है। अलनीनो कमजोर पड़ने के बाद प्रशांत महासागर में सामान्य स्थिति लौटेगी या ला नीना विकसित होगा, यह आने वाले महीनों के समुद्री तापमान और वायुमंडलीय परिस्थितियों पर निर्भर करेगा।
फिलहाल WMO के अक्टूबर 2026 के पूर्वानुमान में अलनीनो के दिसंबर तक और मजबूत होने तथा फरवरी 2027 तक बने रहने की संभावना जताई गई है। इसलिए इसके बाद तत्काल ला नीना आने की पुष्टि नहीं की जा सकती।
मौसम वैज्ञानिक समुद्र की सतह और गहराई के तापमान, व्यापारिक हवाओं, बादलों की गतिविधियों और बारिश के पैटर्न पर लगातार नजर रख रहे हैं। इन आंकड़ों के आधार पर ही भविष्य में प्रशांत महासागर की जलवायु स्थिति का अधिक सटीक अनुमान लगाया जा सकेगा।
कुल मिलाकर, अलनीनो और ला नीना केवल समुद्र के तापमान में होने वाले बदलाव नहीं हैं, बल्कि ये पूरी दुनिया की जलवायु व्यवस्था को प्रभावित करने वाली महत्वपूर्ण प्राकृतिक प्रक्रियाएं हैं। मौजूदा अलनीनो की असाधारण ताकत ने मौसम वैज्ञानिकों की चिंता बढ़ा दी है। अब सबकी नजर इस बात पर है कि फरवरी 2027 के बाद प्रशांत महासागर किस दिशा में आगे बढ़ता है और इसका दुनिया के मौसम पर क्या प्रभाव पड़ता है।



