लखनऊ: मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ऑफ इंडिया के महासचिव डॉ. मोइन खान (मम्मू) ने दिल्ली में एक के बाद एक सामने आ रहे घटनाक्रमों पर गहरी चिंता व्यक्त करते हुए कहा है कि देश में कानून के शासन, संवैधानिक मर्यादाओं और न्याय के समान मानदंड को जिस तरह सवालों के घेरे में लाया जा रहा है, वह लोकतंत्र के लिए बेहद चिंताजनक और खतरनाक संकेत है। सरकार और प्रशासन यह बात अच्छी तरह समझ लें कि अल्पसंख्यकों, दलितों, पिछड़े वर्गों और वंचित नागरिकों के धैर्य को कमजोरी समझना बड़ी भूल होगी।
डॉ. मोइन खान ने कहा कि एक ओर साकेत पुलिस स्टेशन में महिला पत्रकारों शाहीन खान और नफीसा खान ने कथित मारपीट और दुर्व्यवहार के गंभीर आरोप लगाए हैं, जिन्हें दिल्ली पुलिस ने खारिज किया है, वहीं दूसरी ओर जंतर-मंतर के मामले में दलित छात्रा निशू आजाद के पिता संजय कुमार के साथ कथित मारपीट का मामला सामने आया है। इस मामले में स्वतंत्र भारद्वाज का नाम सामने आया है। सवाल केवल एक व्यक्ति की गिरफ्तारी का नहीं, बल्कि देश में कानून के समान और निष्पक्ष अनुपालन का है।
उन्होंने कहा कि निशू आजाद ने अपने पिता के साथ कथित ज्यादती के खिलाफ आवाज उठाई और राजनीतिक नेताओं तथा सामाजिक संगठनों का ध्यान इस ओर आकर्षित किया। इसके बाद सांसद चंद्रशेखर आजाद के थाने पहुंचने, पप्पू यादव के धरने और अन्य कार्यकर्ताओं के विरोध-प्रदर्शन ने इस मामले को राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा में ला दिया। प्रदर्शनकारियों की मांग है कि आरोपी के खिलाफ कड़ी धाराओं में कार्रवाई की जाए। पुलिस की ओर से 72 घंटे के भीतर कार्रवाई का आश्वासन दिया जाना भी मामले की गंभीरता को दर्शाता है।
डॉ. मोइन खान ने कहा कि यदि एक दलित परिवार को न्याय के लिए सड़क पर उतरना पड़े और दूसरी ओर मुस्लिम महिला पत्रकार अपने पेशेवर दायित्वों के निर्वहन के दौरान कथित दुर्व्यवहार और मारपीट का आरोप लगाएं, तो सरकार को गंभीरता से विचार करना होगा कि आम जनता का व्यवस्था पर विश्वास क्यों कमजोर हो रहा है। कानून न बहुसंख्यक का गुलाम है और न अल्पसंख्यक का; कानून सभी के लिए समान होना चाहिए।
उन्होंने मांग की कि दोनों मामलों की स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच कराई जाए, सीसीटीवी फुटेज समेत सभी संबंधित साक्ष्यों को सुरक्षित रखा जाए और दोषी पाए जाने वालों के खिलाफ बिना किसी भेदभाव के कड़ी कानूनी कार्रवाई की जाए। उन्होंने दो टूक कहा कि पुलिस हो या राजनीतिक नेतृत्व, कोई भी संविधान से ऊपर नहीं है। सरकारें बदलती हैं, सत्ता के चेहरे बदलते हैं, लेकिन संविधान कायम रहता है। इसलिए अल्पसंख्यकों, दलितों, पिछड़े वर्गों और निष्पक्ष पत्रकारों के धैर्य की अब और परीक्षा न ली जाए।



