नई दिल्ली। कोविड-19 महामारी के बाद दुनिया भर में बढ़े कर्ज के स्तर को लेकर भारतीय रिजर्व बैंक के गवर्नर संजय मल्होत्रा ने चिंता जताई है। नई दिल्ली में आयोजित पांचवें कौटिल्य इकोनॉमिक कॉन्क्लेव में उन्होंने वैश्विक वित्तीय स्थिरता के सामने मौजूद प्रमुख जोखिमों पर बात करते हुए कहा कि ऊंचा वैश्विक कर्ज आने वाले समय में वित्तीय व्यवस्था के लिए चुनौती बन सकता है। उन्होंने साथ ही मौजूदा वित्तीय मजबूती को लेकर अति-आत्मविश्वास से बचने और लगातार निगरानी बनाए रखने पर जोर दिया।
RBI गवर्नर के मुताबिक, वैश्विक अर्थव्यवस्था इस समय कई तरह की अनिश्चितताओं से गुजर रही है। इनमें बढ़ता सरकारी कर्ज, ऊंची वित्तीय लीवरेज, निजी क्रेडिट से जुड़े जोखिम, कुछ परिसंपत्तियों के ऊंचे मूल्यांकन और साइबर सुरक्षा से जुड़े खतरे शामिल हैं। उन्होंने कहा कि मौजूदा समय में वित्तीय प्रणाली में तत्काल किसी बड़े तनाव के स्पष्ट संकेत नहीं हैं, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि भविष्य में जोखिम पैदा नहीं हो सकते।
गवर्नर ने वैश्विक कर्ज को वित्तीय स्थिरता के लिए प्रमुख जोखिमों में शामिल करते हुए बताया कि कई देशों में कर्ज का स्तर ऊंचा बना हुआ है। उनके अनुसार, वैश्विक कर्ज-से-जीडीपी अनुपात बढ़ा है और कई जगहों पर सरकारी बॉन्ड की यील्ड भी ऊंची हुई है। इसका असर सरकारों की उधारी लागत पर पड़ सकता है। जब सरकारों को पहले के मुकाबले अधिक ब्याज चुकाना पड़ता है, तो उनके पास विकास और अन्य सार्वजनिक खर्चों के लिए उपलब्ध राजकोषीय गुंजाइश सीमित हो सकती है।
कोविड महामारी के दौरान दुनिया के कई देशों ने अर्थव्यवस्था को संभालने के लिए बड़े पैमाने पर राजकोषीय और मौद्रिक सहायता दी थी। सरकारों ने लोगों और कारोबार को राहत देने के लिए खर्च बढ़ाया, जबकि केंद्रीय बैंकों ने लंबे समय तक आसान वित्तीय परिस्थितियां बनाए रखीं। महामारी के दौरान अपनाए गए इन उपायों ने आर्थिक गतिविधियों को सहारा दिया, लेकिन इसके साथ कई देशों के सरकारी कर्ज में भी तेज बढ़ोतरी हुई। RBI के पूर्व प्रकाशित विश्लेषण में भी महामारी के दौरान दिए गए बड़े राजकोषीय प्रोत्साहन को वैश्विक सरकारी कर्ज बढ़ने का एक महत्वपूर्ण कारण बताया गया था।
अब महामारी के बाद परिस्थितियां बदल चुकी हैं। कई अर्थव्यवस्थाओं में महंगाई को नियंत्रित करने के लिए ब्याज दरें बढ़ाई गईं। इसका सीधा असर कर्ज की लागत पर पड़ा। जिन सरकारों, कंपनियों और संस्थानों पर पहले से कर्ज है, उनके लिए ऊंची ब्याज दरों का मतलब अधिक ऋण सेवा लागत हो सकता है। यही वजह है कि RBI गवर्नर ने वैश्विक कर्ज के बढ़ते स्तर को केवल सरकारों की समस्या के रूप में नहीं, बल्कि व्यापक वित्तीय स्थिरता से जुड़े मुद्दे के रूप में देखने की जरूरत बताई है।
वैश्विक स्तर पर कर्ज की स्थिति का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि इंस्टीट्यूट ऑफ इंटरनेशनल फाइनेंस के आंकड़ों के मुताबिक 2026 की पहली छमाही में वैश्विक कर्ज करीब 365 ट्रिलियन डॉलर तक पहुंच गया था। यह वैश्विक जीडीपी के लगभग 311 प्रतिशत के बराबर था। हालांकि, यह अनुपात 2021 के कोविड-पश्चात शिखर से कम है, लेकिन ऊंची ब्याज दरों के कारण कर्ज की सर्विसिंग लागत कई अर्थव्यवस्थाओं के लिए चुनौती बनी हुई है।
RBI गवर्नर ने यह भी स्पष्ट किया कि वैश्विक वित्तीय स्थिरता के सामने खतरा केवल कर्ज तक सीमित नहीं है। उन्होंने पांच प्रमुख जोखिमों की ओर ध्यान आकर्षित किया। इनमें ऊंचा वैश्विक कर्ज, खासकर आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस से जुड़ी परिसंपत्तियों का बढ़ा हुआ मूल्यांकन, बैंकों के बाहर बढ़ती लीवरेज, निजी क्रेडिट से जुड़े जोखिम और AI से जुड़े साइबर खतरे शामिल हैं। उनके अनुसार, अगर इनमें से कई जोखिम एक साथ सामने आते हैं तो वित्तीय प्रणाली पर दबाव बढ़ सकता है।
ऊंचे कर्ज का एक महत्वपूर्ण प्रभाव सरकारी वित्त पर पड़ सकता है। अगर किसी देश की सरकार पर पहले से बड़ी मात्रा में कर्ज है और उसे नई उधारी भी करनी पड़ती है, तो ब्याज दरों में बढ़ोतरी उसके बजट पर अतिरिक्त दबाव डाल सकती है। RBI गवर्नर ने इसी ओर संकेत करते हुए कहा कि अधिक उधारी लागत से सरकारों की राजकोषीय गुंजाइश कम हो सकती है और कर्ज की स्थिति और चुनौतीपूर्ण बन सकती है।
इसका असर कॉरपोरेट क्षेत्र पर भी पड़ सकता है। ऊंची ब्याज दरों और सख्त वित्तीय परिस्थितियों में कंपनियों के लिए कर्ज चुकाना महंगा हो जाता है। यदि कंपनियों की आय में अपेक्षित वृद्धि नहीं होती और ब्याज लागत लगातार बढ़ती है, तो उनकी वित्तीय स्थिति प्रभावित हो सकती है। ऐसे में बैंकों और अन्य वित्तीय संस्थानों के सामने भी जोखिम बढ़ सकता है, खासकर तब जब कंपनियों की ओर से लिए गए कर्ज में डिफॉल्ट बढ़ने लगे।
RBI गवर्नर ने भारत की वित्तीय व्यवस्था को लेकर हालांकि सकारात्मक तस्वीर पेश की। उन्होंने कहा कि भारत का वित्तीय तंत्र फिलहाल मजबूत और लचीला बना हुआ है। बैंकों की बैलेंस शीट और पूंजी स्थिति मजबूत होने के साथ गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियां भी नियामकीय पूंजी मानकों से ऊपर हैं। लेकिन उन्होंने यह भी कहा कि मौजूदा मजबूती को भविष्य में किसी भी तरह के झटके से पूरी तरह सुरक्षित होने की गारंटी नहीं माना जाना चाहिए।
भारत के संदर्भ में बाहरी कर्ज की स्थिति पर भी RBI के आंकड़े महत्वपूर्ण हैं। मार्च 2026 के अंत में भारत का बाहरी कर्ज 762.8 अरब डॉलर था, जो एक साल पहले की तुलना में 26.3 अरब डॉलर अधिक था। बाहरी कर्ज और जीडीपी का अनुपात 20.8 प्रतिशत रहा। RBI के अनुसार, इसी अवधि में भारत के बाहरी कर्ज की सर्विसिंग लागत चालू प्राप्तियों के 5.8 प्रतिशत के बराबर रही, जो एक साल पहले 6.6 प्रतिशत थी।
RBI गवर्नर की चिंता का एक बड़ा पहलू यह भी है कि वित्तीय बाजारों में लंबे समय तक स्थिरता रहने पर निवेशकों और संस्थानों में जोखिम लेने की प्रवृत्ति बढ़ सकती है। ऐसी स्थिति में अगर अचानक कोई बड़ा आर्थिक, भू-राजनीतिक या वित्तीय झटका आता है, तो उसका असर तेजी से दिखाई दे सकता है। इसी कारण उन्होंने वित्तीय प्रणाली में लगातार निगरानी और जोखिमों की पहचान पर जोर दिया।
उन्होंने वैश्विक वित्तीय व्यवस्था में बदलते जोखिमों के बीच नीति निर्माताओं को सतर्क रहने की जरूरत बताई। वैश्विक अर्थव्यवस्था इस समय केवल पारंपरिक आर्थिक जोखिमों से नहीं जूझ रही है, बल्कि भू-राजनीतिक तनाव, व्यापारिक अनिश्चितता, तकनीकी बदलाव और साइबर जोखिम भी वित्तीय स्थिरता को प्रभावित कर सकते हैं। ऐसे माहौल में किसी एक क्षेत्र में पैदा हुई समस्या दूसरे बाजारों तक भी पहुंच सकती है।
RBI गवर्नर का संदेश ऐसे समय में आया है जब दुनिया भर में सरकारों के सामने आर्थिक विकास और राजकोषीय अनुशासन के बीच संतुलन बनाए रखने की चुनौती बनी हुई है। महामारी के दौरान अर्थव्यवस्थाओं को बचाने के लिए बढ़ाया गया सरकारी खर्च उस समय जरूरी माना गया था, लेकिन अब कई देशों के सामने बढ़े हुए कर्ज को नियंत्रित करने और भविष्य के लिए पर्याप्त राजकोषीय गुंजाइश बनाए रखने की चुनौती है।
कुल मिलाकर, RBI गवर्नर संजय मल्होत्रा की टिप्पणी वैश्विक वित्तीय व्यवस्था में बढ़ते जोखिमों को लेकर एक चेतावनी के तौर पर सामने आई है। उन्होंने तत्काल किसी बड़े वित्तीय संकट की बात नहीं कही, बल्कि इस बात पर जोर दिया कि मौजूदा स्थिरता के बीच भी जोखिमों को नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए। बढ़ता वैश्विक कर्ज, ऊंची उधारी लागत और बदलते वित्तीय जोखिम आने वाले समय में नीति निर्माताओं के लिए महत्वपूर्ण चुनौती बने रह सकते हैं। भारत के लिए फिलहाल मजबूत वित्तीय आधार राहत की बात है, लेकिन RBI के मुताबिक वैश्विक परिस्थितियों को देखते हुए सतर्क निगरानी और जोखिम प्रबंधन लगातार जरूरी रहेगा।



